देश को कट्टरपंथ में धकेलने वाली कांग्रेस, अब समय है प्रगतिशील मुस्लिम नेतृत्व का डॉ. सिंह

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ब्राम्ह अनुभूति अखबार यूपी लाइव न्यूज 24 उत्तर प्रदेश

संपादक प्रवीण सैनी

भारत को चाहिए कलाम जैसे नेता, न कि अतीक-अंसारी जैसे अपराधी : डॉ. राजेश्वर सिंह

लखनऊ सरोजनीनगर के विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने अपने विस्तृत सोशल मीडिया विचारों में कांग्रेस पार्टी की तुष्टिकरण राजनीति को ऐतिहासिक तथ्यों के साथ प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि “कांग्रेस पार्टी, भारत में मुस्लिम तुष्टिकरण की जननी है। आज़ादी से पूर्व ही कांग्रेस ने वोट बैंक की राजनीति का बीज बो दिया था और स्वतंत्रता के बाद उसे संस्थागत रूप दे दिया।”

*आज़ादी से पहले की राजनीति – तुष्टिकरण की शुरुआत*

डॉ. सिंह ने बताया कि 1916 का लखनऊ पैक्ट वह पहला अवसर था, जब कांग्रेस ने मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन की मांग को स्वीकार कर साम्प्रदायिकता को वैधता दी। 1920 के ख़िलाफ़त आंदोलन में कांग्रेस ने तुर्की के खलीफा के समर्थन में राजनीति की, जिसके परिणामस्वरूप मालाबार में हुए मोपला नरसंहार जैसी घटनाओं की तक निंदा नहीं की। 1942 में कांग्रेस मंत्रिमंडल में मुस्लिम लीग को प्रतिनिधित्व मिला और 1947 में विभाजन की त्रासदी ने 1.5 करोड़ लोगों को विस्थापित कर दिया, 15–20 लाख निर्दोषों की हत्या हुई और लाखों महिलाओं पर अमानवीय अत्याचार हुए।

इस प्रकार राष्ट्रीय एकता की कीमत पर कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टिकरण को जन्म दिया और देश को विभाजन की पीड़ा झेलनी पड़ी।

*स्वतंत्र भारत में तुष्टिकरण का संस्थानीकरण -*

डॉ. सिंह ने विस्तार से बताया कि आज़ादी के बाद कांग्रेस ने तुष्टिकरण को नीतिगत स्तर पर स्थापित किया। पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों को अनदेखा कर, भारत में रह गए मुस्लिमों को विशेष संरक्षण। 1950 का नेहरू–लियाकत समझौता, जिसमें भारतीय मुसलमानों को सुरक्षा दी गई, परंतु पाकिस्तान में हिंदू–सिख अल्पसंख्यकों की दुर्दशा जारी रही।

1955–56 में केवल हिंदू कानूनों में सुधार, जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ पर कोई बदलाव नहीं किया। हज सब्सिडी (1959), शाह बानो केस (1985), वक्फ अधिनियम (1995), सच्चर समिति (2006), और मनमोहन सिंह का बयान कि “देश के संसाधनों पर पहला हक़ मुसलमानों का” – इन सबने तुष्टिकरण की पराकाष्ठा को दिखाया।

डॉ. सिंह के अनुसार, कांग्रेस ने बहुसंख्यक समाज के साथ लगातार भेदभाव किया और मुस्लिम तुष्टिकरण को संस्थागत रूप दिया।

*यूपीए काल और वर्तमान – वोट बैंक राजनीति की निरंतरता :*

UPA सरकार के दौर को कांग्रेस की वोट बैंक राजनीति का चरम बताते हुए डॉ. सिंह ने कहा: कम्युनल ओलेंस बिल में दंगों के लिए बहुसंख्यक को दोषी मानने का प्रावधान किया गया। आर टी ई (2009) में मदरसों को छूट देकर 2.5 करोड़ बच्चों को आधुनिक शिक्षा से वंचित किया गया।आतंकवाद पर नरमी, POTA हटाना, SIMI पर ढील और अफजल गुरु को बचाने की कोशिश। “हिंदू आतंकवाद” जैसी थ्योरी से भारत की सांस्कृतिक छवि धूमिल करने का प्रयास।शाहीनबाग आंदोलन, CAA विरोध और हिजाब विवाद में कांग्रेस का खुला समर्थन।

“कांग्रेस ने वही किया जो 1916 में शुरू किया था – मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति। यही कारण है कि दशकों तक राम मंदिर का विरोध किया गया और अदालत में अड़ंगे डाले गए।”

*भविष्य की राह – प्रगतिशील मुस्लिम नेतृत्व:*

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि अब भारत को मध्यमार्गी, प्रगतिशील और अग्रगामी मुस्लिम नेतृत्व की आवश्यकता है।

उन्होंने स्पष्ट कहा, “धार्मिक नेताओं को मस्जिदों तक सीमित रहना चाहिए, राजनीति का निर्धारण नहीं करना चाहिए। मुस्लिम महिलाओं को सम्मान, शिक्षा और बराबरी का अधिकार मिलना चाहिए। समाज को अशिक्षा, कट्टरपंथ और पुरानी जकड़नों से बाहर आना होगा।”

*दो सवाल, जिन पर मुस्लिम समाज को आत्ममंथन देश को कट्टरपंथ में धकेलने वाली कांग्रेस, अब समय है प्रगतिशील मुस्लिम नेतृत्व का – डॉ. सिंह

भारत को चाहिए कलाम जैसे नेता, न कि अतीक-अंसारी जैसे अपराधी : डॉ. राजेश्वर सिंह

लखनऊ सरोजनीनगर के विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने अपने विस्तृत सोशल मीडिया विचारों में कांग्रेस पार्टी की तुष्टिकरण राजनीति को ऐतिहासिक तथ्यों के साथ प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि “कांग्रेस पार्टी, भारत में मुस्लिम तुष्टिकरण की जननी है। आज़ादी से पूर्व ही कांग्रेस ने वोट बैंक की राजनीति का बीज बो दिया था और स्वतंत्रता के बाद उसे संस्थागत रूप दे दिया।”

*आज़ादी से पहले की राजनीति – तुष्टिकरण की शुरुआत*

डॉ. सिंह ने बताया कि 1916 का लखनऊ पैक्ट वह पहला अवसर था, जब कांग्रेस ने मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन की मांग को स्वीकार कर साम्प्रदायिकता को वैधता दी। 1920 के ख़िलाफ़त आंदोलन में कांग्रेस ने तुर्की के खलीफा के समर्थन में राजनीति की, जिसके परिणामस्वरूप मालाबार में हुए मोपला नरसंहार जैसी घटनाओं की तक निंदा नहीं की। 1942 में कांग्रेस मंत्रिमंडल में मुस्लिम लीग को प्रतिनिधित्व मिला और 1947 में विभाजन की त्रासदी ने 1.5 करोड़ लोगों को विस्थापित कर दिया, 15–20 लाख निर्दोषों की हत्या हुई और लाखों महिलाओं पर अमानवीय अत्याचार हुए।

इस प्रकार राष्ट्रीय एकता की कीमत पर कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टिकरण को जन्म दिया और देश को विभाजन की पीड़ा झेलनी पड़ी।

*स्वतंत्र भारत में तुष्टिकरण का संस्थानीकरण -*

डॉ. सिंह ने विस्तार से बताया कि आज़ादी के बाद कांग्रेस ने तुष्टिकरण को नीतिगत स्तर पर स्थापित किया। पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों को अनदेखा कर, भारत में रह गए मुस्लिमों को विशेष संरक्षण। 1950 का नेहरू–लियाकत समझौता, जिसमें भारतीय मुसलमानों को सुरक्षा दी गई, परंतु पाकिस्तान में हिंदू–सिख अल्पसंख्यकों की दुर्दशा जारी रही।

1955–56 में केवल हिंदू कानूनों में सुधार, जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ पर कोई बदलाव नहीं किया। हज सब्सिडी (1959), शाह बानो केस (1985), वक्फ अधिनियम (1995), सच्चर समिति (2006), और मनमोहन सिंह का बयान कि “देश के संसाधनों पर पहला हक़ मुसलमानों का” – इन सबने तुष्टिकरण की पराकाष्ठा को दिखाया।

डॉ. सिंह के अनुसार, कांग्रेस ने बहुसंख्यक समाज के साथ लगातार भेदभाव किया और मुस्लिम तुष्टिकरण को संस्थागत रूप दिया।

*यूपीए काल और वर्तमान – वोट बैंक राजनीति की निरंतरता :*

UPA सरकार के दौर को कांग्रेस की वोट बैंक राजनीति का चरम बताते हुए डॉ. सिंह ने कहा: Communal Violence Bill (2011) में दंगों के लिए बहुसंख्यक को दोषी मानने का प्रावधान किया गया। RTE (2009) में मदरसों को छूट देकर 2.5 करोड़ बच्चों को आधुनिक शिक्षा से वंचित किया गया।आतंकवाद पर नरमी, POTA हटाना, SIMI पर ढील और अफजल गुरु को बचाने की कोशिश। “हिंदू आतंकवाद” जैसी थ्योरी से भारत की सांस्कृतिक छवि धूमिल करने का प्रयास।शाहीनबाग आंदोलन, CAA विरोध और हिजाब विवाद में कांग्रेस का खुला समर्थन।

“कांग्रेस ने वही किया जो 1916 में शुरू किया था – मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति। यही कारण है कि दशकों तक राम मंदिर का विरोध किया गया और अदालत में अड़ंगे डाले गए।”

*भविष्य की राह – प्रगतिशील मुस्लिम नेतृत्व:*

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि अब भारत को मध्यमार्गी, प्रगतिशील और अग्रगामी मुस्लिम नेतृत्व की आवश्यकता है।

उन्होंने स्पष्ट कहा, “धार्मिक नेताओं को मस्जिदों तक सीमित रहना चाहिए, राजनीति का निर्धारण नहीं करना चाहिए। मुस्लिम महिलाओं को सम्मान, शिक्षा और बराबरी का अधिकार मिलना चाहिए। समाज को अशिक्षा, कट्टरपंथ और पुरानी जकड़नों से बाहर आना होगा।”

*दो सवाल, जिन पर मुस्लिम समाज को आत्ममंथन करना चाहिए :*

1. नेतृत्व का चुनाव – क्यों डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जैसे महान वैज्ञानिक और राष्ट्रपति जैसी हस्तियाँ बड़े पैमाने पर मुस्लिम समाज से नहीं निकलीं, और इसके स्थान पर अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी, तस्लीमुद्दीन और शाहबुद्दीन जैसे अपराधियों को नेता बनाया गया?

2. प्रगति या पतन – क्यों दुबई जैसे देश शिक्षा और विकास से विश्वस्तरीय मॉडल बन गए, जबकि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान चरमपंथ और अस्थिरता में फंसे हैं?

डॉ. राजेश्वर सिंह ने अंत में कहा:
“भारत को आज ऐसे प्रगतिशील और अग्रगामी मुस्लिम समाज की आवश्यकता है, जो शिक्षा, रोज़गार और सुधार की राह पर चले। सच्चा नेतृत्व वही है जो प्रेरणा दे, आत्ममंथन करे और समाज को कट्टरपंथ से बाहर लाकर तरक़्क़ी की ओर ले जाए।”

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