बुद्ध, कबीर और रविदास जी की परंपरा एवं विचारधारा के वाहक थे संत गाडगे महाराज

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यूपी लाइव न्यूज 24 उत्तर प्रदेश

सह संपादक कपिल गुप्ता

शिवगढ़ रायबरेली
विकास खंड अंतर्गत तथागत बुद्ध विहार एवं बोधिसत्व बाबा साहब डॉ.भीमराव आंबेडकर प्रेरणा स्थल ग्राम-चंदापुर पोस्ट गूढ़ा, जनपद रायबरेली में सोमवार को प्रातः महान समाज सुधारक राष्ट्र संत, गाडगे बाबा का जन्म दिवस स्थानीय उपासकों द्वारा धूमधाम से मनाया गया। इस अवसर पर वक्ताओं द्वारा संत गाडगे बाबा के जीवन व उनके व्यक्तित्व बारे में अवगत कराते हुए बताया गया कि यदि ध्यान से देखा और समझा जाए, तो बाबा गाडगे तथागत बुद्ध, संत कबीर और संत रविदास जी की परंपरा एवं विचारधारा के ही वाहक नजर आते हैं। उनकी शिक्षाओं को देखकर ऐसा लगता है कि वह बुद्ध, कबीर और रविदास जी से बहुत अधिक प्रभावित थे। यह संयोग ही है कि संत रविदास जी और गाडगे बाबा की जयंती एक ही महीने फरवरी में पड़ती है। वह स्वच्छता पर विशेष जोर देते थे। वह हमेशा अपने साथ एक झाड़ू रखते थे, जो स्वच्छता का प्रतीक था। वह कहते थे कि सुगंध देने वाले फूलों को पात्र में रखकर मूर्तियों पर अर्पित करने के बजाय चारों ओर बसे हुए लोगों की सेवा के लिए अपना खून खपाओ। भूखे लोगों को रोटी खिलाई, तो ही तुम्हारा जन्म सार्थक होगा। पूजा के उन फूलों से तो मेरा झाड़ू ही श्रेष्ठ है। बाबा को औपचारिक शिक्षा ग्रहण करने का अवसर नहीं मिला था। उन्होंने शिक्षा के महत्व को इस हद तक प्रतिपादित किया कि यदि खाने की थाली भी बेचनी पड़े, तो उसे बेचकर भी शिक्षा ग्रहण करो। हाथ पर रोटी लेकर खाना खा सकते हो पर विद्या के बिना जीवन अधूरा है। वह अपने प्रवचनों में शिक्षा पर बोलते समय बाबा साहब डा. भीमराव अम्बेडकर जी को उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत करते हुए कहते थे कि देखा बाबा साहब अंबेडकर अपनी महत्वाकांक्षा से कितना पढ़े, शिक्षा कोई एक ही वर्ग की ठेकेदारी नहीं है, एक गरीब का बच्चा भी अच्छी शिक्षा लेकर ढेर सारी डिग्रियाँ हासिल कर सकता है। बाबा गाडगे ने अपने समाज में शिक्षा का प्रकाश फैलाने के लिए 31 शिक्षण संस्थाएं तथा एक सौ से अधिक अन्य संस्थाओं की स्थापना की।कहा जाता है कि बाबा साहब के परिनिर्वाण की खबर सुनकर गाडगे बाबा स्तब्ध और दुखी मन से बोले कि जब हमारा सेनापति ही यहां नहीं रहा, तो अब मैं यहां रहकर क्या करूंगा। उनके परिनिर्वाण पर पूरे देश में पिछङों के बीच शोक की लहर दौड़ गई थी। बहुजन समाज ने दिसंबर महीने में कुछ ही दिनों के भीतर अपने दो अमूल्य रत्न(बाबा साहब-06 दिसम्बर, 1956 एवं संत गाडगे बाबा-20 दिसम्बर, 1956) खो दिए थे। उनकी शिक्षाएँ आज भी प्रासंगिक हैं, जिससे हमें प्रेरणा लेने की जरूरत है। उनके समाज-सुधार सम्बन्धी कार्यों को देखते हुए ही बाबा साहब ने उन्हें ज्योतिबा फुले जी  के बाद सबसे बड़ा त्यागी, जनसेवक कहा था, जो उचित ही था। ऐसे युग महापुरुष को उनके जन्म दिवस 23 फरवरी पर बुद्ध विहार में उपस्थित सभी उपासकगणों ने हार्दिक बधाई ज्ञापित कर, पुष्प अर्पित करते हुए कृतज्ञतापूर्ण नमन किया गया।

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