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संपादक प्रवीण सैनी
कर्नाटक में कांग्रेस का संकट गहरा गया है. प्रदेशाध्यक्ष डीके शिवकुमार ने बड़ा खेल कर दिया है. ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि मुख्यमंत्री सिद्दारमैया अब अपनी कुर्सी कितने दिनों तक बचा पाएंगे? दरअसल, राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की हालत पहले ही बहुत पतली है. पूरे देश में उसकी मात्र तीन राज्यों में सरकार है. उसमें सबसे बड़ा कर्नाटक है. इसके अलावा तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश में पार्टी की सरकार है. लेकिन, 2023 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को मिली जीत के बाद से ही सीएम की कुर्सी को लेकर झगड़ा चल रहा है. मुख्यमंत्री सिद्दारमैया और डीके शिवकुमार के बीच यह लड़ाई जगजाहिर है. केंद्रीय नेतृत्व के हस्तक्षेप के बाद राज्य में सत्ता के बंटवारे का फॉर्मूला तय हुआ था. डीके शिवकुमार खेमा दावा करता है कि ढाई-ढाई साल के रोटेशनल सीएम का फॉर्मूला तय हुआ था. इस कारण बीते कुछ दिनों से डीके शिवकुमार खेमा बार-बार परोक्ष तौर पर सीएम की कुर्सी पर अपना दावा ठोकता रहा है.
इस बीच ताजा अपडेट यह है कि मुख्यमंत्री सिद्दारमैया के राजनीतिक सलाहकार वरिष्ठ नेता बीआर पाटिल ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. इससे राज्य कांग्रेस के बीच जारी तकरार एक बार फिर सामने आ गई है. पाटिल को मुख्यमंत्री सिद्दारमैया खेमा का नेता माना जाता है. वह उनके खास करीबी माने जाते हैं. लेकिन, राज्य में कांग्रेस के कई खेमों में बंटे होने की वजह से उनके लिए कैबिनेट में जगह नहीं बनी. पिछले माह ही सिद्दारमैया खेमे के नेताओं ने एक डिनर पार्टी की थी. इसके बाद यह ताजा राजनीतिक संकट पैदा हुआ है.
पाटिल का इस्तीफा
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक सूत्रों का दावा है कि पाटिल का इस्तीफा सीधे तौर पर सिद्दारमैया और डीके शिवकुमार के बीच टकराव का नतीजा नहीं है. पाटिल कलाबुरगी जिले के अलांद से चार बार के विधायक हैं. उन्होंने सरकार और पार्टी में उचित महत्व नहीं मिलने के कारण इस्तीफा दिया है. इस क्षेत्र में डीके शिवकुमार का कुछ खास प्रभाव नहीं है. कलाबुरगी कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का इलाका है. यहीं से खरगे के बेटे प्रियांक खरगे उनकी राजनीतिक विरासत संभाल रहे हैं. लेकिन पाटिल और प्रियांग खरगे का रिश्ता बहुत अच्छा नहीं है. यही कारण है कि एक वरिष्ठ नेता होने के बावजूद सिद्दारमैया सरकार में पाटिल को जगह नहीं मिली.
सिद्दारमैया ने क्या कहा
इस्तीफे की खबर पर सीएम सिद्दारमैया ने कहा कि वह इस बारे में पाटिल से बात करेंगे. दरअसल, कलाबुरगी में प्रियांक का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है. इस कारण पाटिल लगातार खुद को साइडलाइन महसूस कर रहे हैं. बावजूद इसके कि वह सीएम के करीबी हैं. 2023 में सरकार बनने के बाद पाटिल को मंत्री बनाने की बात हुई थी, लेकिन कलाबुरगी से प्रियांक और एक अन्य विधायक शरन प्रकाश को मंत्री पद मिल गया. यहां सिद्दारमैया की नहीं चली. इसके बाद सिद्दारमैया ने पाटिल को अपना राजनीतिक सलाहकार बना लिया. सूत्रों का कहना है कि पाटिल सरकार और प्रशासन में अपनी सीमित भूमिका की वजह से नाखुश थे. सीएम सिद्दारमैया भी उनके कोई खास राजनीतिक सलाह मशविरा नहीं कर रहे थे. अब पाटिल के इस्तीफे के बाद कर्नाटक कांग्रेस के भीतर की तकरार सामने आ गई है. ऐसे में देखना होगा कि पहले ही तकरार और खेमाबंदी की शिकार पार्टी आगे क्या फैसला लेती है.