ब्राम्ह अनुभूति अखबार यूपी लाइव न्यूज 24 उत्तर प्रदेश
सह संपादक कपिल गुप्ता
बुद्ध ,कबीर और रविदास के विचार धारा के वाहक थे- संत गाडगे
शिवगढ़ रायबरेली
विकासखंड अंतर्गत तथागत बुद्ध विहार एवं बोधिसत्व बाबा साहब डॉ.भीमराव आंबेडकर प्रेरणा स्थल ग्राम-चंदापुर पोस्ट गूढ़ा, जनपद रायबरेली में बृहस्पतिवार को महान समाज सुधारक राष्ट्र संत, गाडगे बाबा का जन्म दिवस स्थानीय उपासकों द्वारा धूमधाम से मनाया गया। इस अवसर पर वक्ताओं द्वारा उपासकों को संत गाडगे बाबा के बारे में अवगत कराते हुए बताया गया कि बीसवीं सदी के समाज-सुधार आन्दोलन में जिन महान बहुजन महापुरूषों का योगदान रहा है, उनमें से एक महान समाज सुधारक महापुरूष का नाम बाबा गाडगे का है। यदि ध्यान से देखा और समझा जाए, तो बाबा गाडगे तथागत बुद्ध, संत कबीर और संत रविदास जी की परंपरा एवं विचारधारा के ही वाहक नजर आते हैं। उनकी शिक्षाओं को देखकर ऐसा लगता है कि वह बुद्ध, कबीर और रविदास जी से बहुत अधिक प्रभावित थे। यह संयोग ही है कि संत रविदास और गाडगे बाबा की जयंती एक ही महीने फरवरी में पड़ती है। संत गाडगे बाबा का जन्म आज ही के दिन 23 फरवरी, 1876 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले की तहसील अंजन गांव सुरजी के शेगाँव नामक गाँव में बहुजन समाज (धोबी जाति) में हुआ था। उनकी माताजी का नाम सखूबाई और पिताजी का नाम झिंगराजी था। बाबा गाडगे जी का पूरा नाम देवीदास डेबूजी झिंगराजी जाड़ोकर था। घर में उनके माता-पिता उन्हें प्यार से ‘डेबू जी’ कहते थे। डेबू जी सभी साधनों का त्याग कर हमेशा अपने साथ मिट्टी के मटके जैसा एक बर्तन रखते थे। इसी बर्तन में वह बुद्ध की भांति खाना भी खाते और पानी भी पीते थे। महाराष्ट्र में मटके के टुकड़े को गाडगा कहते हैं। इसीलिए लोग उन्हें गाडगे महाराज और बाद में गाडगे बाबा कहने लगे। कालान्तर में वह अपने सत्कार्यों से संत गाडगे के नाम से प्रसिद्ध हो गये। गाडगे बाबा बाबा साहब डा. भीमराव अम्बेडकर जी के समकालीन थे तथा वह बाबा साहब से आयु में पन्द्रह साल बड़े थे। वैसे तो गाडगे बाबा बहुत से राजनीतिज्ञों से मिलते-जुलते रहते थे। लेकिन वह बाबा साहब के कार्यों से अत्यधिक प्रभावित थे।इसका कारण था कि जो समाज सुधार सम्बन्धी कार्य वह अपने कीर्तन के माध्यम से लोगों को उपदेश देकर कर रहे थे, वही कार्य बाबा साहब राजनीति के माध्यम से उस समय कर रहे थे।
अन्य संतों की भाँति गाडगे बाबा को भी औपचारिक शिक्षा ग्रहण करने का अवसर नहीं मिला था। उन्होंने स्वाध्याय के बल पर ही थोड़ा बहुत पढ़ना-लिखना सीख लिया था। शायद यह बाबा साहब डा. भीमराव अम्बेडकर जी की संगति का ही प्रभाव था कि गाडगे बाबा शिक्षा पर बहुत अधिक जोर देते थे। उन्होंने शिक्षा के महत्व को इस हद तक प्रतिपादित किया कि यदि खाने की थाली भी बेचनी पड़े, तो उसे बेचकर भी शिक्षा ग्रहण करो। हाथ पर रोटी लेकर खाना खा सकते हो पर विद्या के बिना जीवन अधूरा है। वह अपने प्रवचनों में शिक्षा पर बोलते समय बाबा साहब डा. भीमराव अम्बेडकर जी को उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत करते हुए कहते थे कि देखा बाबा साहब अंबेडकर अपनी महत्वाकांक्षा से कितना पढ़े, शिक्षा कोई एक ही वर्ग की ठेकेदारी नहीं है, एक गरीब का बच्चा भी अच्छी शिक्षा लेकर ढेर सारी डिग्रियाँ हासिल कर सकता है।बाबा गाडगे ने अपने समाज में शिक्षा का प्रकाश फैलाने के लिए 31 शिक्षण संस्थाएं तथा एक सौ से अधिक अन्य संस्थाओं की स्थापना की। बाद में सरकार ने इन संस्थाओं के रख-रखाव के लिए एक ट्रस्ट भी बनाया । जनसेवा और समाजोत्थान के कार्यों को करते हुए।बाबा साहब के परिनिर्वाण के मात्र 14 दिनों बाद ही बाबा साहब के निधन से दुखी होकर गाडगे बाबा ने भी उनकी याद में 20 दिसम्बर,1956 को हमेशा के लिए अपनी आँखें बंद कर ली थीं। कहा जाता है कि बाबा साहब के परिनिर्वाण की खबर सुनकर गाडगे बाबा स्तब्ध और दुखी मन से बोले कि जब हमारा सेनापति ही यहां नहीं रहा, तो अब मैं यहां रहकर क्या करूंगा। ऐसे युग महापुरुष को उनके जन्म दिवस 23 फरवरी पर बुद्ध विहार में उपस्थित सभी उपासकगणों ने हार्दिक बधाई ज्ञापित कर, पुष्प अर्पित करते हुए कृतज्ञतापूर्ण नमन किया गया। इस अवसर पर सर्व श्रद्धेय बैजनाथ, रामफेर, शिवबरदान, राम सजीवन गुरूजी, भागीरथ,रजनीश, प्रियांशी, मुस्कान, विक्की, मन्नत, लकी, आदित्य, पलक, रितिक, दिव्यांश, आयुश, अक्षत, सुखमीलाल, मुकेश, राजन आदि उपासकगण उपस्थित रहे।