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विशेष संवाददाता राजस्थान
अलवर: राजस्थान के एकीकरण की कहानी भारत के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, जिसमें अलवर की भूमिका बेहद खास रही. यह प्रक्रिया सात चरणों में पूरी हुई और अंततः 1 नवंबर 1956 को राजस्थान अपने वर्तमान स्वरूप में अस्तित्व में आया. खासतौर पर 15 मई 1949 को राजस्थान के निर्माण के पांचवें चरण में मत्स्य संघ को संयुक्त राजस्थान में शामिल किया गया. इतिहासकार एडवोकेट हरिशंकर गोयल के अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम की नींव अलवर में रखी गई थी.
अलवर से शुरू हुआ राजस्थान का एकीकरण: आजादी के बाद भारत के प्रथम उप प्रधानमंत्री और गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने राजस्थान के एकीकरण की शुरुआत सबसे पहले अलवर से की. उन्होंने अलवर, भरतपुर, धौलपुर और करौली रियासतों को मिलाकर ‘मत्स्य संघ’ की स्थापना की. इस मत्स्य संघ का राजस्थान राज्य में 15 मई 1949 को विलय कर दिया गया. इसके साथ ही अलवर को मत्स्य संघ की राजधानी घोषित किया गया. मत्स्य संघ के प्रशासनिक ढांचे में महत्वपूर्ण पदों का गठन किया गया, जिसमें धौलपुर महाराजा को संघ का राजप्रमुख और भरतपुर महाराजा को उपराजप्रमुख बनाया गया. वहीं, बाबू शोभाराम (अलवर) को मुख्यमंत्री (प्रधानमंत्री) नियुक्त किया गया, जबकि जुगल किशोर चतुर्वेदी (भरतपुर), मंगलसिंह टांक (धौलपुर), मास्टर भोलानाथ (अलवर), गोपीलाल यादव (भरतपुर) और चिरंजीलाल शर्मा (करौली) को मंत्री पद सौंपे गए.
राजाओं पर दबाव और विलय की स्वीकृति: इतिहासकार हरिशंकर गोयल ने बताया कि भारत के तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल ने 3 फरवरी 1948 को अलवर के तत्कालीन महाराजा तेजसिंह और प्रधानमंत्री खर्रे को दिल्ली बुलाया. जहां उन्होंने विलय पत्र पर हस्ताक्षर किया. अंततः पांच फरवरी 1948 को महाराजा तेजसिंह ने अलवर रियासत को भारत सरकार को सौंप दिया. इसी क्रम में मई 1948 में नीमराणा के राजा राजेंद्र सिंह ने अपनी रियासत को मत्स्य संघ में मिला दिया. उस समय नीमराणा स्टेट में 30 गांव थे. इसके अलावा, शाहजहांपुर, बाबड़ी, चौबारा, संसदी और फौलादपुर को पंजाब से अलग करके अलवर में शामिल किया गया. विलय के बाद अलवर के तत्कालीन महाराजा को प्रतिवर्ष 6 लाख 20 हजार रुपये और नीमराणा के राजा को 30 हजार रुपये प्रीविपर्स के रूप में दिए जाने का निर्णय लिया गया.
अलवर में सरदार पटेल का ऐतिहासिक भाषण: गोयल ने बताया कि 25 फरवरी 1948 को सरदार वल्लभभाई पटेल अलवर आए और राजर्षि कॉलेज ग्राउंड में एक ऐतिहासिक भाषण दिया. इसके बाद 9 मार्च 1948 को केंद्र सरकार ने भरतपुर का शासन अपने हाथों में ले लिया, लेकिन भरतपुर के महाराजा को वहीं रहने की अनुमति दी गई. धौलपुर के महाराजा ने स्वतः ही भारत में विलय की स्वीकृति दे दी और करौली भी भारत संघ में शामिल हो गया. इसके साथ ही 10 मार्च 1948 को अलवर, भरतपुर, धौलपुर और करौली को मिलाकर ‘मत्स्य संघ’ की स्थापना की गई.
एकीकरण की अंतिम कड़ी: 15 मई 1949 को मत्स्य संघ का राजस्थान राज्य में विलय कर दिया गया और इसे राजस्थान के निर्माण के पांचवें चरण के रूप में देखा गया. इसके बाद, सात चरणों की इस पूरी प्रक्रिया का अंतिम रूप 1 नवंबर 1956 को सामने आया, जब राजस्थान अपने वर्तमान स्वरूप में अस्तित्व में आया. राजस्थान के एकीकरण की यह कहानी न केवल ऐतिहासिक महत्व रखती है, बल्कि यह बताती है कि सरदार पटेल और तत्कालीन नेतृत्व ने किस तरह रणनीति बनाकर रियासतों को भारत में मिलाया. अलवर इस पूरी प्रक्रिया में केंद्र बिंदु रहा, जहां से राजस्थान के एकीकरण की शुरुआत हुई. आज भी यह इतिहास राजस्थान की विरासत और उसके स्वाभिमान की कहानी कहता है.