ब्राम्ह अनुभूति अखबार यूपी लाइव न्यूज 24 उत्तर प्रदेश
सह संपादक कपिल गुप्ता
हिन्दू संस्कृति में युगों-युगों से माँ सरस्वती एवं बसन्त पञ्चमी माघ मास के शुक्ल पक्ष की पञ्चमी को बड़ी ही निष्ठा एवं श्रद्धा पूर्वक मनाई जाती है।
सरस्वती हिन्दू धर्म की प्रमुख देवियों में से एक हैं. सरस्वती ब्रह्मा की मानसपुत्री हैं जो विद्या की देवी के रूप में लोक-विश्रुत हैं. सरस्वती माता विभिन्न नामों से भी जानीं जाती हैं जैसे – श्वेतपद्मासना, शारदा,वाणी, वाग्देवी, भारती, वागेश्वरी श्वेत वस्त्रधारिणी इत्यादि कहा जाता है. माँ सरस्वती की उपासना करने से अविद्वान भी विद्वान् बन जाते हैं।
पौराणिक कथा अनुसार जब ब्रह्मा जी ने जब सृष्टि की रचना की तब पेड़-पौधै एवं जीव-जन्तु इत्यादि सब कुछ दिख रहे थे, लेकिन उन्हें किसी वस्तु की कमी लगी. उस कमी को पूरा करने के लिए उन्होंने अपने कमण्डल से जल निकालकर छिड़का तो सुन्दर स्त्री के रूप में एक देवी प्रकट हुई।
उस देवी के एक हाथ में वीणा दूसरे हाथ में पुस्तक तीसरे हाथ में माला और चौथा हाथ वर मुद्रा में था. जब उस देवी ने वीणा बजाया तो सृष्टि की प्रत्येक वस्तु में स्वर आ गया. इसी से उनका नाम पड़ा देवी सरस्वती और यह दिन था बसन्त पञ्चमी का, तभी से देव लोक और मृत्यु (पृथ्वी) लोक में माँ सरस्वती पूजा होने लगी।
माँ सरस्वती *साहित्य, संगीत, कला तथा विद्या* की देवी के रूप में प्रतिष्ठित है. इस पर्व को मनाने का मुख्य उद्देश्य है शिक्षा की महत्ता को जन-जन तक पहुँचाना।
हिन्दू परम्परा के अनुसार बसन्त पञ्चमी के दिन माता-पिता अपने बच्चों को विद्याध्ययन के लिए गुरुकुल में गुरु को सौंपते थे. इसी दिन गुरुकुल में विद्या की देवी माँ सरस्वती की पूजा की जाती थी।
हिन्दू पञ्चाङ्ग में ०६ ऋतुएँ होती हैं. इनमें बसन्त ऋतु को ऋतुओं का राजा माना गया है. शरद् ऋतु की कड़ाके की ठण्ड के बाद प्रकृति अपने यौवन पर होती है. इस मौसम में खेतों में सरसों की फसल पीले फूलों के साथ, आम के पेड़ पर आए फूल, चारों ओर हरियाली और गुलाबी ठण्ड मौसम को और भी अधिक सुन्दर बना देती है।
बसन्त पञ्चमी के दिन पीले चावल या पीले रंग का भोजन किया जाता है. पीला रंग त्याग और समर्पण का प्रतीक है. इस दिन पीले वस्त्र एवं पीले रंग का भोजन करने के पीछे यह भाव है कि मानव में त्याग और समर्पण का भाव जगे।
माँ सरस्वती एवं बसन्त पञ्चमी पूजा मुहूर्त
इस वर्ष पञ्चमी ०२ फरवरी प्रातः ०९:१४ पर आरम्भ होगी और ०३ फरवरी को प्रातः ०६:५२ मिनट पर समाप्त होगी।
बसन्त पञ्चमी एवं सरस्वती पूजा मुहूर्त ०२ फरवरी प्रातः ०७ बजकर ०९ मिनट से दोपहर १२ बजकर ३५ मिनट तक रहेगा. सरस्वती पूजा मुहूर्त ०५ घण्टे २६ मिनट तक है।
बसन्त पञ्चमी प्रेम और हर्षोल्लास का पर्व है बसन्त पञ्चमी, इस दिन संगीत, वाणी, मातृत्व, आध्यात्मिकता, ज्ञान, ग्रन्थ, मन्त्र, तन्त्र विद्या और नदियों की अधिष्ठात्री देवी, मंत्र (दक्षिण मार्ग/वैदिक मार्ग) और तंत्र (वाम मार्ग) विद्या और कला की देवी माँ सरस्वती की पूजा की जाती है।
सरस्वति महाभागे
विद्ये कमललोचने।
विद्यारूपे विशालाक्षि
विद्यां देहि नमोऽस्तु ते।।
अर्थात्:- हे महाभाग्यवती ज्ञानरूपा कमल के समान विशाल नेत्र वाली, ज्ञानदात्री सरस्वती! मुझको विद्या दो, मैं आपको प्रणाम् करता हूँ।*
बसन्त तो सभी ऋतुओं का राजा है। ये दिन बहुत पावन और शुभ है और इसलिए इस दिन को मांगलिक कामों के लिए चुना जाता है। इस दिन माँ सरस्वती को पीले फूल अर्पित किए जाते हैं। पीले प्रसाद का भोग उन्हें लगाया जाता है तो वहीं लोग इस दिन पीले वस्त्र भी धारण करते हैं। इसके पीछे भी विशेष कारण है। वास्तव में पीला रंग खुशी, प्रेम और ऊर्जा का मानक है। पीला रंग सूर्य का भी है, जो ऊर्जा और जोश का प्रतीक है।
बसन्त आते ही ठंड कम होने लगती है। इसलिए कहा जाता है कि “आया बसन्त पाला उड़न्त।” फूलों में नए रंग और पेेड़ों में नई पत्तियां नजर आती हैं। ठंडी और कड़कड़ाती सर्दी के बाद से सूर्य की गर्माहट लोग महसूस करने लगते हैं जिससे ठंड के कारण से शिथिल पड़े लोगों के अंदर भी जोश भर जाता है इसलिए बसंत पञ्चमी पर लोग पीले वस्त्र पहनते हैं। वैसे भी पीला रंग स्मरण शक्ति को बढ़ाता है और मन को एकाग्रता देता है।
अक्सर गुरुकुल की दीवारों का रंग पीला होता है। पीला शुभता और खुशी का भी मानक है। पीला रंग हल्दी का होता है इसलिए तो वो इतनी पवित्र मानी जाती है। यही कारण है कि लोग बसन्त पञ्चमी के दिन पीला वस्त्र पहनते हैं और पीला भोजन करते हैं।
बसन्त पञ्चमी से जुड़ी विशेष बातें-
आदिकाल से बसन्त पञ्चमी का त्योहार बड़े ही पावन ढंग से देश में मनाया जाता है।
बसन्त पञ्चमी का उल्लेख ऋष पञ्चमी में मिलता है।
बसन्त पञ्चमी को ज्ञान और कला की देवी माँ सरस्वती के जन्मदिवस के रूप में पूजा जाता है।
माघ महीने के पांचवे दिन बसन्त पञ्चमी का पर्व मनाते हैं।
इस दिन माँ सरस्वती के अतिरिक्त विष्णु और कामदेव की पूजा करते हैं।
बसन्त पञ्चमी के ही दिन भगवान राम ने शबरी के आश्रम में उसके जूठे बेरों को खाया था।
बसन्त पञ्चमी के ही दिन पृथ्वीराज ने नेत्रहीन होने के बाद भी मोहम्मद गोरी को मारा था।
बसन्त पञ्चमी के ही दिन सिखों के दसवें गुरु, श्री गुरु गोबिन्द सिंह साहब जी का विवाह हुआ था।
बसन्त पञ्चमी के ही दिन हिन्दी साहित्य के महान कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म हुआ था।
वीर हकीकत राय ने धर्म की रक्षा के लिए वीरगति प्राप्त की थी।
आप सभी को माँ सरस्वती पूजन एवं बसन्त पञ्चमी की बहुत-बहुत बधाई और हार्दिक शुभकामनाएँ। आइये हम सब सत्य और ज्ञान के मार्ग पर चलकर राष्ट्र निर्माण में योगदान करें