यूपी लाइव न्यूज 24 उत्तर प्रदेश
ब्यूरो प्रमुख दुर्गेश अवस्थी
नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि अगर मामला करप्शन का हो और आरोप केंद्र सरकार के कर्मियों पर लगे, तो राज्य सरकार की पुलिस को जांच करने का पूरा अधिकार है. कोर्ट ने कहा कि वह जांच करने के बाद मामले में आरोप भी दाखिल कर सकती है. कोर्ट भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से संबंधित मामले की सुनवाई कर रही थी.
अपने फैसले में कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार को किसी भी तरह से सीबीआई की पूर्व अनुमति प्राप्त करने की कोई आवश्यकता नहीं होगी, यदि संबंधित मामले में केंद्र सरकार के कर्मी पर करप्शन के आरोप लगे हों तो.
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने मामले की सुनवाई की. कोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अपराधों की जांच राज्य एजेंसी या केंद्रीय एजेंसी या किसी भी पुलिस एजेंसी द्वारा की जा सकती है, इस शर्त के साथ कि पुलिस अधिकारी एक विशेष रैंक का होना चाहिए. पीठ ने कहा कि इसका उल्लेख अधिनियम की धारा 17 में देखा जा सकता है.
धारा 17 में लिखा है कि राज्य पुलिस या राज्य की किसी विशेष एजेंसी को केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार और कदाचार से संबंधित मामलों को दर्ज या जांच करने से नहीं रोकती है.
बेंच ने कहा, “सुविधा और काम के दोहराव से बचने के लिए, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को केंद्र सरकार और उसके उपक्रमों के कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के मामलों की जांच का जिम्मा सौंपा गया है, और भ्रष्टाचार रोधी ब्यूरो – राज्य की एक विशेष जांच एजेंसी – को राज्य सरकार और उसके उपक्रमों के कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के मामलों की जांच का जिम्मा सौंपा गया है.”
कोर्ट ने फैसले के औचित्य के बारे में कहा कि करप्शन एक्ट के तहत मामले कॉग्निजेबल ऑफेंस होते हैं, इसलिए स्टेट पुलिस इसकी जांच कर सकती है. सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश राजस्थान हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखते हुए आया है, जिसमें केंद्र सरकार के एक कर्मचारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया गया था.
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि यह ठीक है कि आरोपी सेंट्रल गवर्मेंट का कर्मचारी है, लेकिन राजस्थान एंटी करप्शन ब्यूरो ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के प्रावधानों के तहत आपराधिक मामला दर्ज किया है, लिहाजा उसे इस मामले की जांच का पूरा अधिकार है. कोर्ट ने उन दलीलों को मानने से इनकार कर दिया, जिसमें दलील दी गई थी कि जब तक सीबीआई अनुमति नहीं प्रदान कर देती है, तब तक मामला आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट ने इसी फैसले पर अपनी मुहर लगाई है.
बेंच ने कहा, “सुविधा के लिए और काम के दोहराव से बचने के लिए, विशेष पुलिस प्रतिष्ठान के तहत एक विशेष जांच एजेंसी, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को केंद्र सरकार और उसके उपक्रमों के कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के मामलों की जांच का कार्य सौंपा गया है, और राज्य सरकार और उसके उपक्रमों के कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के मामलों की जांच का कार्य राज्य की एक विशेष जांच एजेंसी, भ्रष्टाचार विरोधी ब्यूरो को सौंपा गया है.”
बेंच ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156 किसी भी पुलिस स्टेशन के प्रभारी पुलिस अधिकारी को मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना संज्ञेय अपराध की जांच करने का अधिकार देती है. संहिता की धारा 2 के खंड (एस) में ‘पुलिस स्टेशन’ शब्द को इस प्रकार परिभाषित किया गया है कि इसका अर्थ राज्य सरकार द्वारा सामान्यतः या विशेष रूप से पुलिस स्टेशन घोषित किया गया कोई भी चौकी या स्थान है, और इसमें राज्य सरकार द्वारा इस संबंध में निर्दिष्ट कोई भी स्थानीय क्षेत्र शामिल है.