लखनऊ में उत्तराखंड के लोगो द्वारा हरसौलास के साथ मनाया फूलदेई का त्योहार

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यूपी लाइव न्यूज 24 उत्तर प्रदेश

मुख्य संपादक प्रवीण सैनी लखनऊ

*चैत्र संक्रांति के साथ उत्तराखंड मना रहा है प्रकृति देवी का पर्व – फूलदेई*

*“कौन हो तुम वसंत के दूत,*
*विरस पतझड़ में अति सुकुमार।*
*घन तिमिर में चपल की रेख,* 
*तपन में शीतल मंद बयार।”*

‘कामायनी’ में जयशंकर प्रसाद जी द्वारा लिखी गई ये पंक्तियाँ उत्तराखंड के लोकपर्व *‘फूलदेई’* या *‘फूल संक्रान्ति’* की सटीक व्याख्या करती हैं। देवभूमि उत्तराखंड विभिन्न संस्कृतियों को समेटे एक विशाल सभ्यता का नाम है। उत्तराखंड में संक्रांत से महीने बदलता है कई तरह की जाति और जनजातियों के मिश्रण से बना यह राज्य अपने नैसर्गिक रूप में ही अपने त्यौहारों के माध्यम से अपनी सुन्दर सांस्कृतिक धरोहरों को बयाँ करता है। उत्तराखंड में हिन्दू मास की प्रत्येक संक्रान्ति को एक विशेष त्यौहार के साथ मनाया जाता है जो उस माह की विशेषता से जुड़ा होता है। जैसे, फसल को बोने से लेकर काटने पर, स्थानीय ग्राम्य देवताओं की पूजा पर, विवाहिता महिलाओं के मायके से आने और जाने पर अलग-अलग त्यौहारों का खूब प्रचलन है।
इन्हीं में से एक है चैत्र मास के प्रथम दिन से मनाया जाने वाला पर्वतीय अंचल का लोकपर्व फूलदेई! इस त्यौहार का खास तौर पर बच्चों को बहुत इंतजार रहता है। इस संस्कृति का सबसे बड़ा महत्व ये भी देखने को मिलता है कि हिन्दू मान्यता में नवीन वर्ष को ठीक पतझड़ की समाप्ति और बसंत ऋतु के आगमन पर मनाया जाता है। और महीने भर चलने वाला यह लोकपर्व वैशाखी के दिन समाप्त हो जाता है।
यह समय नवीन ऊर्जा के संचार का होता है। खेतों में हरे गेहूँ और पीली सरसों नव वर्ष का स्वागत करते हैं। सर्दियों के मौसम की विदाई के उपरांत पहाड़ की ऊँची चोटियों पर पड़ी बर्फ धीरे-धीरे पिघलने लगती है। वनों में वृक्षों पर नई कोंपल आनी शुरू हो जाती हैं और हर फलदार वृक्ष फूलों से भर जाते हैं। लेकिन उत्तराखंड की पहचान विशेष रूप से खेतों की मुंडेर पर उगने वाले पीले फ्योंली के फूलों और जंगल में खिलने वाले लाल बुराँस के फूलों से की जा सकती है। ये दोनों फूल इतने खूबसूरत होते हैं कि कई लोक गीतों में प्रेमी और प्रेमिका के सौंदर्य की तुलना इनसे की जाती है। चारों ओर पहाड़ के जंगल, गाँवों में आड़ू, सेब, खुमानी, पोलम, मेलू के पेड़ों के रंग बिरंगे सफेद फूलों से बसंत के इस मौसम को बासंती बना देते है।

*प्रकृति देवी की उपासना का प्रतीक है फूल संक्रान्ति*

हिन्दू वेद और उपनिषदों में प्रकृति को देवी के रूप में पूजनीय बताया गया है। जिसका प्रमुख उद्देश्य निश्चित रूप से मानव को प्रकृति के साथ आत्मीयता बढ़ाना और उसका संरक्षण करना है। फूलदेई त्यौहार में गाँव के बच्चे सुबह उठकर जंगलों में जाकर रंगीन फूल चुनकर लाते हैं और सूर्योदय से पहले उन्हें अपने घर के पूजा-स्थान, देहरी और चूल्हे को चढ़ाते हैं। साथ ही बच्चे सुबह घर-घर जाकर घरों और मंदिरों की देहरी पर रंगबिरंगे फूल, चावल आदि बिखेरते हैं। पलायन जैसी महामारी झेल रहा उत्तराखंड राज्य आज अपनी हर संस्कृति से विमुख होता जा रहा है। समय के साथ हर बड़े रीति-रिवाज, त्यौहार और परम्पराएँ सोशल मीडिया तक सीमित होकर रह गई हैं।
*बाँस की लकड़ियों से बनी टोकरी में लाते हैं रंगीन फूल*

बच्चे चैत्र मास के पहले दिन से बुराँस, फ्योंली, सरसों, कठफ्योंली, आड़ू, खुबानी, भिटौर, गुलाब आदि फूलों को तोड़कर घर लाते हैं। फूलों को ‘रिंगाल’ से बनी टोकरी में सजाते हैं। बच्चे घर-घर जाकर  *“फूलदेई-फूल देई छम्मा देई दैणी द्वार भर भकार यो देई सौं बारंबार नमस्कार”* कहकर घरों और मंदिरों की देहरी पर फूल बिखरते हैं। इन पंक्तियों का अर्थ है,  *“देहरी के फूल भरपूर और मंगलमयी हो, घर की देहरी क्षमाशील हों और सबकी रक्षा करें, सबके घरों में अन्न का पूर्ण भंडार हो।”*
बदले में लोग बच्चों को आशीर्वाद देेकर गुड़, चावल, मिठाई और पैसे दक्षिणा के रूप में भेंट करते हैं। शाम को पारम्परिक गढ़वाली-कुमाउँनी पकवान बनाकर आस-पड़ोस में बाँटे जाते हैं। देखा जाए तो फूल संक्रान्ति बच्चों को प्रकृति प्रेम और सामाजिक चिंतन की शिक्षा बचपन से ही देने का एक आध्यात्मिक पर्व है।
*उत्तराखंड में चैत का महीना” भिटौली” के लिए भी जाना जाता है*
विशिष्ट परम्पराओ के लिए उत्तराखंड की अलग पहचान है इन्ही परंपरओं में एक मायके एवं ससुराल के प्रेम की अनूठी प्राचीन परम्पराओ में “भिटौली” भी है। आज भी उत्तराखंड की विवाहित बहने चैत महीने का इंतजार करती है।क्योंकि इस महीने मायके से उन्हें भिटौली दी जाती हैभाई अपनी बहिनो को भिटौली देता है। “भिटौली” का शाब्दिक अर्थ है ‘भेंट देना’ । समय के साथ इसके स्वरूप में बदलाव आया है लेकिन मायके एवं ससुराल के प्रेम की यह परम्परा आज भी हरसौउल्लास के साथ निभाई जा रही है।भिटौली सिर्फ रिवाज ही नही बल्कि विवाहताओ के लिए मायके से जुड़ी यादों को समेटकर रखने का वार्षिक आयोजन है।भाई अपनी बहनों के लिये पूड़ी हलुआ, लगड़, मिठाई, वस्त्र,जेवर,एवं परंपरागत व्यंजनों के साथ जाता है।मायके से आने वाले व्यंजनों को पूरे ससुराल और गाँव बांटा जाता है।भिटौली का जल्दी आना सुब्ब् माना जाता है बदलते परवेस में आज भी भिटौली की यह परंपरा जीवित है।शादी के बाद आने वाले पहले चैत माह को काला महीना मानते हुए लड़की 5 दिन या पूरे महीने मायके में ही रहती है।यह भी कहा जाता है कि शादी के बाद पहेले चैत महीने के 5 दिन तक पत्नी को अपने पति के मुख को भी नही देखना होता है।इसलिए वह मायके चली जाती है।
*पहाड़ों से पलायन उत्तराखंड की संस्कृति को लीलता जा रहा है*

शिक्षा और रोजगार के लिए पहाड़ों से दूर जाना लोगों की मजबूरी बन चुकी है, जिसका नतीजा है कि अब पहाड़ धीरे-धीरे खाली होते जा रहे हैं। यहाँ के घर-गाँवो में सदियों से मनाए जाने वाले खुशियों और नव वर्ष के इस फुलारी/फूलदेई पर्व को भी पलायन ने अपनी चपेट में ले लिया है। पहाड़ के कई गाँवो में अब इस त्यौहार को मनाने के लिए बच्चे ही नहीं हैं क्योंकि इन गाँवो में केवल कुछ बुजुर्ग ही बाकी रह गए हैं, जो बस खंडहरों के प्रहरी की तरह अपने घरों की रखवाली करते नजर आते हैं।
उम्मीद है कि यह सभ्यता सोशल मीडिया तक सिमटने से पहले एक बार फिर जरूर गुलज़ार होगी। बसंत का यह त्यौहार उत्साह और उम्मीद का प्रतीक है, शायद पहाड़ अपने बसंत के दूतों की चहचहाहट से फिर जरूर महकेगा।

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