1857 की क्रांति का गवाह है रामलला मंदिर,इसी मंदिर में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के थे गुरु और बीता था बचपन

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यूपी लाइव न्यूज 24 उत्तर प्रदेश

उप संपादक संजय मिश्रा

कोंच जालौन सदियों से चली आ रही परम्परा इस वर्ष भी नगर के प्राचीन रामलला सरकार मंदिर पर सावन का झूला डालकर निभाई गयी चौदह दिन तक चले इस झूला उत्सव का मंगलवार को पूजा अर्चना के बाद समापन हो गया।
आजादी की पहली क्रांति 1857 का गवाह नगर का रामलला मंदिर आज भी सावन के इस पावन मौके पर हमें स्वतंत्रता के साथ सावन में झूला की याद बरबस दिला देता है यह वही मंदिर है जहां झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का बचपन बीता था। रानी यहां सावन के इन्हीं दिनों में इस मंदिर में झूला झूला करती थी। लक्ष्मीबाई की जन्मपत्री भी इस मंदिर में दो दशक पहले तक सुरक्षित रखी रही।
मोहल्ला गांधी नगर में स्थित रामलला मंदिर नगरवासियों की आस्था का केंद्र वर्षो से बना हुआ है। इस मंदिर की ख्याति दूर-दूर तक फैली है। बताते हैं कि इस मंदिर से सीधी एक सुरंग झांसी के लिए तक जाती थी 1857 की गदर के बाद रानी लक्ष्मीबाई इसी सुरंग के रास्ते से कोंच आयी थीं। यहां आकर उन्होंने अंग्रेजों से युद्ध किया था। रानी और अंग्रेजों की इस लड़ाई में उनका वफादार मीर खां पिंडारे मारा गया था। जिसकी कब्र आज भी नगर में बनी है। इस युद्ध में पराजय के बाद लक्ष्मी बाई कोंच से कालपी की ओर भागी थीं। स्वतंत्रता की लड़ाई का गवाह रामलला मंदिर के इस झूला उत्सव पर 14 दिनों तक विभिन्न कार्यक्रम होते रहे। इसमें भगवान राम को झूला झुलाया जाता है, पुरुष स्त्री के कपड़े पहनकर नाचते गाते हैं, इन्हीं सती कहा जाता है। यह लोग बाहरी जनपदों से यहां आकर इस उत्सव में शामिल होते हैं। नगरवासी भी वहां पहुंचकर पूरे श्रद्धा के साथ इस उत्सव में भाग लेते हैं। मंदिर के महंत रघुनाथ दास बताते हैं कि झूला उत्सव में बाहरी प्रदेशों के लोग भी आते हैं। उन्होंने बताया कि महारानी लक्ष्मीबाई भी इस उत्सव में पधारती थीं। उनका इस मंदिर से विशेष स्नेह था। झूला उत्सव का मंगलवार को धूमधाम समापन हो गया

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