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उप संपादक संजय मिश्रा
चतुर्दशी तिथि छय: होने से भीष्म पंचक चार दिन के
अलीगढ कार्तिक महीने में देवोत्थान एकादशी से पूर्णिमा तक भीष्म पंचक पर्व मनाया जाता है, इन पाँच दिनों में पूजन एवं अर्चन से व्यक्ति जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकते है।मान्यता है कि निःसन्तान दम्पति यदि भीष्म पंचक का व्रत करता है तो उस दम्पति को सन्तान की प्राप्ति होती है।इसके अलावा यश,वैभव की वृद्धि वैकुण्ठ प्राप्ति के लिए भी भीष्म पंचक व्रत करना चाहिए।वैदिक ज्योतिष संस्थान के प्रमुख स्वामी पूर्णानंदपुरी महाराज ने भीष्म पंचक पूजा की जानकारी देते हुए कहा कि महाभारत में पाण्डवों की जीत के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण पाण्डवों को लेकर ज्ञान प्राप्ति के उद्देश्य से भीष्म पितामह के पास गए,सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा में शैय्या पर लेटे हुए भीष्म पितामह ने पाँच दिन तक पाण्डवों को वर्ण धर्म,मोक्ष धर्म और राज धर्म के बारे में ज्ञान दिया।ज्ञान प्राप्ति के उपरांत श्रीकृष्ण ने भीष्म से इन पाँच दिनों के महत्व को लोक मंगलकारी कहा और इन्हें भीष्म पंचक कहा गया।वहीं देवउठनी एकादशी से प्रारंभ होने वाले पाँच दिवसीय पर्व के पहले दिन भगवान नारायण अपने चार माह की योग निद्रा से जागते हैं।अतः भीष्म पंचक व्रत पालन करने वाले लोगों को उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द उत्तिष्ठ गरुडध्वज, उत्तिष्ठ कमलाकान्त त्रैलोक्यमन्गलं कुरु। श्लोक के माध्यम से तीनों लोकों के कल्याणकारी भगवान विष्णु को जगाना चाहिए।इस व्रत में चार द्वार वाला एक मण्डप बनाया जाता है जिसको गाय के गोबर से लीप कर बीच में एक वेदी बनाकर कलश स्थापित करें।इसके बाद भगवान वासुदेव की पूजा होती है।इस व्रत के दौरान कार्तिक शुक्ल की एकादशी से लेकर कार्तिक की पूर्णिमा तिथि तक घी के दीपक जलाए जाते हैं और इन पाँच दिनों(इस बर्ष चतुर्दशी तिथि छय: होने के कारण चार दिन )तक सात्विक जीवन के साथ ब्रह्मचर्य का भी पालन करना चाहिए। इतना ही नहीं जो भी भक्त इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करते है उन्हें मृत्यु के पश्चात् मोक्ष तथा उत्तम गति की प्राप्ति होती है। इस व्रत को करने वाले व्यक्ति सदैव स्वस्थ रहते हैं।व्रत के अंतिम दिन कार्तिक पूर्णिमा के दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान आदि से निवृत होकर एक चौकी पर पीले रंग का कपड़ा बिछाकर भगवान लक्ष्मीनारायण की प्रतिमा स्थापित करें।धूप,दीप जलाकर भगवान विष्णु का ध्यान एवं स्तुति पाठ करें।भगवान श्रीसत्यनारायण की कथा का श्रवण करें तथा शाम होने पर संध्या आरती कर फलों का भोग श्री लक्ष्मी नारायण को लगाएं।स्वामी पूर्णानंदपुरी महाराज के अनुसार भीष्म पंचक व्रत के दौरान दीपदान करने का विशेष महत्व है,माना जाता है कि इन पांच दिवसीय पर्व के प्रतिदिन दीपदान करने से व्यक्ति के जीवन में सभी प्रकार के कष्टों से छुटकारा मिलता है साथ ही दरिद्रता दूर होती है और घर में कभी भी धन की कमी नहीं होती है।