मेधा पाटकर को मिली जमानत, सजा पर रोक; वीके सक्सेना के मानहानि केस में किया गया था गिरफ्तार

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ब्राम्ह अनुभूति अखबार यूपी लाइव न्यूज 24 उत्तर प्रदेश

सह संपादक कपिल गुप्ता

नई दिल्ली: दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना की ओर से दाखिल आपराधिक मानहानि के मामले में दोषी करार दी गईं मेधा पाटकर को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया था. इसके बाद उन्हें कोर्ट में पेश किया गया, जहां कोर्ट ने उन्हें जमानत दे दी. साथ ही जुर्माने की एक लाख रुपए और परिवीक्षा बॉन्ड के तौर पर 25 हजार का मुचलका भरने का निर्देश भी दिया गया. दिल्ली हाईकोर्ट ने 20 मई तक के लिए सजा पर रोक लगा दी है. इससे पहले 23 अप्रैल को साकेत कोर्ट के सेशंस कोर्ट ने जुर्माने की एक लाख रुपए के जुर्माने की रकम जमा नहीं करने पर मेधा पाटकर के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया था.
एडिशनल सेशंस जज विशाल सिंह ने यह गैर जमानती वारंट जारी किया. 23 अप्रैल को सुनवाई के दौरान वीके सक्सेना की ओर से पेश वकील ने कहा था कि न तो मेधा पाटकर ने जुर्माने की रकम जमा की और न ही कोर्ट में उपस्थित हुईं. इसपर कोर्ट ने मेधा पाटकर के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी करने का आदेश दिया था. इससे पहले 22 अप्रैल को दिल्ली हाईकोर्ट ने सेशंस कोर्ट की ओर से एक लाख रुपए के जुर्माने के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था. हाईकोर्ट ने मेधा पाटकर को इसके लिए सेशंस कोर्ट जाने को कहा था.
कोर्ट ने दी थी राहत: बता दें कि, 8 अप्रैल को सेशंस कोर्ट ने दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना की ओर से दाखिल आपराधिक मानहानि के मामले में दोषी करार दिए गए नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर को राहत देते हुए एक साल के लिए परिवीक्षा (किसी अपराधी की जेल जाने के बजाय निगरानी में रखना ताकि वह फिर से अपराध न करे) पर रहने का आदेश दिया था. इसका मतलब है कि मेधा पाटकर को मजिस्ट्रेट कोर्ट की ओर से मिली तीन महीने की जेल की सजा की जगह एक साल के लिए परिवीक्षा के तहत रहना होगा. कोर्ट ने मेधा पाटकर को अपने अच्छे आचरण की अंडरटेकिंग की शर्त पर परिवीक्षा के रहने की अनुमति दी थी. ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने 1 जुलाई, 2024 को मेधा पाटकर को सजा सुनाई थी. कोर्ट ने कहा था कि इस मामले में अधिकतम सजा दो साल की होती है, लेकिन मेधा पाटकर के स्वास्थ्य को देखते हुए पांच महीने की सजा दी जाती है.

यह है मामला: मेधा पाटकर के खिलाफ वीके सक्सेना ने आपराधिक मानहानि का केस अहमदाबाद की कोर्ट में 2001 में दायर की थी. गुजरात के ट्रायल कोर्ट ने इस मामले पर संज्ञान लिया थाय बाद में 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई गुजरात से दिल्ली के साकेत कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया था. मेधा पाटकर ने 2011 में अपने आप को निर्दोष बताते हुए ट्रायल का सामना करने की बात कही थी. वीके सक्सेना ने जब अहमदाबाद में केस दायर किया था उस समय वो नेशनल काउंसिल फॉर सिविल लिबर्टीज के अध्यक्ष थे.

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