यूपी लाइव न्यूज 24 उत्तर प्रदेश
सह संपादक कपिल गुप्ता
मध्यप्रदेश के रतलाम जिले के पंछीवा गांव ने यह साबित कर दिया है कि भारत भले ही 21वीं सदी में जी रहा हो, लेकिन कुछ गांव अब भी सीधी छलांग लगाकर मनुस्मृति युग में लौट चुके हैं। गांव की चौपाल में बैठकर फैसला सुना दिया गया कि जो प्रेम विवाह करेगा, वह गांव का नहीं रहेगा। उसे न दूध मिलेगा, न किराना, न कोई सामाजिक रिश्ता। उसके घर कोई शादी-ब्याह, तेरहवीं, पूजा-पाठ में कोई पंडित नहीं जाएगा । न पंडित आएगा, न नाई। प्रेम करने वाला परिवार सामाजिक तौर पर मृत घोषित कर दिया जाएगा।
यह फैसला सुनते ही लगता है कि जैसे गांव ने संविधान को नहीं, बल्कि किसी तानाशाह की निजी डायरी को मान्यता दे दी हो। बालिग लड़का-लड़की अपनी मर्जी से शादी करें, यह अधिकार देश की सर्वोच्च अदालतें बार-बार कह चुकी हैं, लेकिन पंछीवा गांव के लिए सुप्रीम कोर्ट से बड़ी उसकी चौपाल है, कानून से बड़ा उसका फरमान है और लोकतंत्र से बड़ी उसकी भीड़ है।
इस बहिष्कार में सबसे पहले भगवान को शामिल किया गया। कहा गया कि ऐसे परिवार के यहां कोई धार्मिक आयोजन नहीं होगा क्योकि जब पंडित ही नही तो आयोजन कैसा , यानी प्रेम करना अब इतना बड़ा पाप हो गया कि ईश्वर भी नाराज हो जाएंगे। सवाल उठता है कि अगर भगवान प्रेम से नाराज हो जाते हैं, तो फिर वे किस बात से खुश होते हैं? नफरत से? हिंसा से? सामाजिक दमन से? शायद हां, क्योंकि व्यवहार तो यही बता रहा है।
गांव का नाई बाल नहीं काटेगा, मानो बाल काटना कोई सामाजिक सेवा नहीं बल्कि संस्कार का प्रमाण हो। दूध वाला दूध नहीं देगा, मानो दूध गाय का नहीं बल्कि पंचायत की कृपा से निकलता हो। किराना दुकानदार राशन नहीं देगा, जैसे आटा-चावल भी अब प्रेम विरोधी हो गए हों। इस पूरे तंत्र में प्रेम करने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे इंसान से बहिष्कृत होकर वस्तु बन जाता है ऐसी वस्तु जिसे समाज उठाकर बाहर फेंक देना चाहता है।
विडंबना यह है कि यही समाज फिल्मों में प्रेम कहानियां देखकर तालियां बजाता है, गानों में प्रेम को अमर बताता है, राधा-कृष्ण के नाम पर मेला लगाता है और मंचों से प्रेम का महिमामंडन करता है। लेकिन जैसे ही प्रेम घर के दरवाजे तक आ जाता है, वही समाज तलवार निकाल लेता है। तब प्रेम संस्कृति नहीं रहता, तब वह बदनामी बन जाता है।
इस पूरे मामले में सबसे खतरनाक बात यह नहीं है कि गांव ने यह फैसला लिया, बल्कि यह है कि प्रशासन की चुप्पी इसे मौन सहमति में बदल देती है। सवाल यह नहीं है कि पंचायत ने क्या कहा, सवाल यह है कि कानून कहां है? पुलिस कहां है? जिला प्रशासन कहां है? क्या प्रेम करने वालों की सुरक्षा भी अब भीड़ की मर्जी पर छोड़ दी गई है?
आज अगर प्रेम विवाह करने वालों का बहिष्कार हो रहा है, तो कल दोस्ती पर पहरा होगा। परसों पसंद के कपड़ों पर, उसके बाद पसंद की पढ़ाई पर और फिर सोचने पर भी। समाज जब प्रेम से डरने लगता है, तो वह धीरे-धीरे तानाशाही की गोद में बैठ जाता है।
सबसे बात यह है कि यह सब “संस्कार” के नाम पर किया जा रहा है। सवाल यह है कि कौन से संस्कार? वे संस्कार जिन्होंने कभी शिव-पार्वती, राम-सीता, राधा-कृष्ण की कहानियां रचीं या वे संस्कार जो आज प्रेम से कांप जाते हैं? अगर यही संस्कार हैं, तो फिर असंस्कार किसे कहेंगे?
एक मोहन वह था जिसने प्रेम को ईश्वर तक पहुंचने का रास्ता बताया। और एक मोहन यह है, जिसके समय में प्रेम करने वालों को गांव से बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है।
पहले प्रेम करने से मोक्ष मिलता था,अब प्रेम करने से सामाजिक बहिष्कार। फर्क बस इतना है कि पहले समाज प्रेम के आगे झुकता था, आज प्रेम को समाज के आगे झुकाया जा रहा है।