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मुख्य संपादक प्रवीण सैनी लखनऊ
शिरोडा, (गोवा): “किसी भी प्रकार की बीमारी पर विजय पाने के लिए शारीरिक उपचार के साथ-साथ आध्यात्मिक उपाय करना अत्यंत आवश्यक है,” ऐसा प्रतिपादन महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय के शोधकर्ता शॉन क्लार्क और श्वेता क्लार्क ने किया। वे शिरोडा स्थित ‘गोमंतक आयुर्वेद महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र’ में ‘उपचार में अध्यात्म की भूमिका’ विषय पर आयोजित अतिथि व्याख्यान में बोल रहे थे।
इस कार्यक्रम में महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. नीलेश कोरडे और गोवा काउंसिल ऑफ आयुर्वेदिक की अध्यक्षा डॉ. स्नेहा भागवत की प्रमुख उपस्थिति रही। साथ ही, लगभग 100 स्नातकोत्तर छात्रों और आयुर्वेद के प्राध्यापकों ने इसमें सक्रिय रूप से भाग लिया। इस अवसर पर महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय के शोध दल ने आधुनिक ‘ऑरा’ और ‘ऊर्जा स्कैनर्स’ के माध्यम से सिद्ध किए गए निष्कर्ष उपस्थित जनसमूह के सामने रखे।
शोध दल ने बताया कि पिछले 25-30 वर्षों में चिकित्सा विज्ञान में अध्यात्म की आवश्यकता बढ़ती जा रही है। इसी कारण वर्ष 1990 की शुरुआत में अमेरिका के मेडिकल कॉलेजों में अध्यात्म-आधारित पाठ्यक्रम शुरू किए गए थे, और एक सर्वेक्षण के अनुसार आज वे लगभग 90% महाविद्यालयों में सम्मिलित किए जा चुके हैं। प्राचीन भारतीय आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार, कर्म (प्रारब्ध) रोगों का एक मुख्य मूल कारण माना गया है, साथ ही वात, पित्त और कफ का असंतुलन भी इसका कारण होता है। हमारे प्राचीन शास्त्रों में बताया गया है कि सुखी और स्वस्थ जीवन के लिए सत्व गुण को बढ़ाना और रज-तम गुणों को कम करना महत्वपूर्ण है।
शोध दल ने आगे बताया कि उन्होंने आधुनिक ऑरा और ऊर्जा स्कैनर्स के साथ-साथ शोध दल के सदस्यों की प्रगत छठी इंद्रिय की सहायता से अनेक शोध किए हैं। उनके निष्कर्षों के अनुसार, जीवन की 50% से अधिक समस्याएं पूर्णतः आध्यात्मिक स्वरूप की होती हैं। प्रारब्ध इसका मुख्य कारण है और गंभीर बीमारियां भी कर्म के अनुसार ही निश्चित होती हैं। नकारात्मक ऊर्जा चिकित्सा समस्याओं को उत्पन्न कर सकती है, उन्हें बढ़ा सकती है या सही निदान में बाधा भी डाल सकती है। ऐसे समय में अनुभवी आयुर्वेद वैद्य ‘भूत नाड़ी’ को पहचान कर यह समझ सकते हैं कि क्या नकारात्मक ऊर्जा सक्रिय है, और आध्यात्मिक उपायों द्वारा उसे दूर करने में सहायता कर सकते हैं।
किसी भी चिकित्सीय समस्या के पीछे तीसरा आध्यात्मिक कारक हमारे पितरों का कष्ट हो सकता है। एक्जिमा, संतान प्राप्ति में कठिनाई या गर्भपात, साथ ही व्यसनाधीनता (नशा) जैसी समस्याएं केवल पारंपरिक दवाओं से पूरी तरह ठीक नहीं हो सकतीं। सत्व गुण बढ़ाने और सर्वांगीण स्वास्थ्य प्राप्त करने के लिए स्व-उपचार, नियमित साधना और सात्त्विक जीवनशैली जैसे आध्यात्मिक उपाय महत्वपूर्ण हैं।
शोध के निष्कर्षों के बारे में उन्होंने बताया कि अपने धर्म के अनुसार ईश्वर का नामस्मरण करना, 15 मिनट का नमक के पानी का उपाय, स्वभाव दोषों पर विजय पाना और ताजा पका हुआ शाकाहारी सात्त्विक भोजन ग्रहण करना—ये सभी आध्यात्मिक समस्याओं (चिकित्सा समस्याओं सहित) पर प्रभावी स्व-उपचार के साधन सिद्ध हो सकते हैं।