कांग्रेस सरकार ने शाहबानो का न्याय क्यों छीना—क्या वोट बैंक महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों से बड़ा था?: डॉ. राजेश्वर सिंह

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यूपी लाइव न्यूज़ 24 उत्तर प्रदेश

तीन तलाक से मुस्लिम महिलाओं की मुक्ति का विरोध क्यों—कांग्रेस बताए, यह कैसा नारी-सम्मान?: डॉ. राजेश्वर सिंह

हिंदू कानूनों में सुधार, मुस्लिम पर्सनल लॉ पर दशकों की चुप्पी—समानता से कांग्रेस का यह चयनात्मक व्यवहार क्यों?: डॉ. राजेश्वर सिंह

मनुस्मृति से लेकर समान नागरिक संहिता तक—कांग्रेस की राजनीति में सिद्धांत एक, लेकिन धर्म देखकर मानदंड अलग क्यों?: डॉ. राजेश्वर सिंह

मनुस्मृति को लेकर कांग्रेस के लगातार बयानों और महिलाओं के अधिकारों पर उसके दावों पर तीखा हमला बोलते हुए सरोजनीनगर विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि महिला सम्मान, समानता और संवैधानिक अधिकारों की बात करने से पहले कांग्रेस को अपने राजनीतिक इतिहास और अपने दोहरे मापदंडों का जवाब देना चाहिए।

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि जब कांग्रेस मनुस्मृति और महिलाओं से जुड़े कथित भेदभावपूर्ण प्रावधानों को लेकर सवाल उठाती है, तो उसके अपने रिकॉर्ड पर नजर डालना भी जरूरी हो जाता है। महिलाओं के अधिकारों, समानता और सम्मान के प्रश्न पर कांग्रेस ने अतीत में जो राजनीतिक फैसले और रुख अपनाए, वे आज भी सवाल खड़े करते हैं।

पहला सवाल — शाहबानो मामला, 1985–86: कांग्रेस सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित कर सुप्रीम कोर्ट के शाहबानो को गुजारा भत्ता देने वाले फैसले को निष्प्रभावी कर दिया। यह महिला अधिकारों की कीमत पर राजनीतिक दबाव के आगे झुकने का स्पष्ट उदाहरण था। महिला अधिकारों से ऊपर राजनीतिक दबाव और वोट-बैंक की राजनीति को प्राथमिकता क्यों दी गई?

दूसरा सवाल — तीन तलाक कानून, 2019: जब मोदी सरकार ने तीन तलाक को अपराध घोषित करने वाला कानून संसद में पेश किया, तब कांग्रेस ने इसके प्रमुख प्रावधानों का विरोध किया। सवाल यह है कि मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों और सम्मान की बात करने वाली कांग्रेस उस समय उनके साथ मजबूती से क्यों नहीं खड़ी हुई?

तीसरा सवाल — समान नागरिक संहिता पर दशकों की चुप्पी: संविधान का अनुच्छेद 44 समान नागरिक संहिता की दिशा में प्रयास करने की बात करता है। दशकों तक सत्ता में रहने के बावजूद कांग्रेस ने इस दिशा में कोई ठोस पहल क्यों नहीं की? महिलाओं के अधिकारों में समानता की बात करने वाली कांग्रेस ने इस संवैधानिक लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए क्या किया?

चौथा सवाल — मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार पर सवाल: 1937 का मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट आज भी लागू है। वहीं, स्वतंत्र भारत में 1955–56 में हिंदू पर्सनल लॉ में व्यापक सुधार किए गए। महिलाओं के अधिकारों के मामले में यह अलग-अलग दृष्टिकोण क्यों रहा? क्या महिलाओं के अधिकार धर्म या समुदाय के आधार पर अलग-अलग होने चाहिए?

पाँचवाँ सवाल — मनुस्मृति को लेकर Selective Outrage क्यों? कांग्रेस नेताओं को हिंदू धर्मग्रंथों और विशेष रूप से मनुस्मृति व विभिन्न ‘स्मृतियों’ में महिलाओं से जुड़े कथित भेदभावपूर्ण प्रावधानों पर सवाल उठाने में कोई संकोच नहीं होता। लेकिन अन्य धार्मिक या पवित्र ग्रंथों में मौजूद महिलाओं से जुड़े ऐसे ही आपत्तिजनक या भेदभावपूर्ण कथनों पर वही मुखरता क्यों नहीं दिखाई देती? यदि वास्तव में उद्देश्य महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करना है, तो विरोध का पैमाना धर्म देखकर अलग-अलग क्यों होना चाहिए?

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई केवल भाषणों और सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित नहीं हो सकती। वास्तविक प्रतिबद्धता का अर्थ है कि हर महिला के अधिकारों, गरिमा और समानता के लिए बिना किसी वोट-बैंक के दबाव के समान रूप से आवाज उठाई जाए।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने तीन तलाक जैसी कुप्रथा के खिलाफ निर्णायक कानून बनाकर मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों और गरिमा की रक्षा की। महिला सशक्तिकरण का अर्थ केवल राजनीतिक नारे लगाना नहीं, बल्कि प्रत्येक महिला को समान अधिकार, सम्मान और न्याय सुनिश्चित करना है।

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि कांग्रेस को मनुस्मृति पर दूसरों को उपदेश देने से पहले शाहबानो से लेकर तीन तलाक तक अपने राजनीतिक इतिहास और महिलाओं के अधिकारों पर अपने दोहरे मानदंडों का आईना जरूर देखना चाहिए। मनुस्मृति से लेकर समान नागरिक संहिता तक, यदि सिद्धांत वास्तव में समानता है, तो उसका पैमाना भी समान होना चाहिए। महिला अधिकार किसी पार्टी की राजनीतिक सुविधा का विषय नहीं, बल्कि संवैधानिक समानता, गरिमा और न्याय का विषय हैं।

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