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वोट चाहिए महिलाओं के, लेकिन अधिकार देने में पीछे क्यों? डॉ. राजेश्वर सिंह का कांग्रेस-सपा पर तीखा प्रहार
सरोजनीनगर के विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने महिला-सम्मान, महिला आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर कांग्रेस एवं समाजवादी पार्टी की राजनीति पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि महिलाओं के सम्मान और सशक्तीकरण की असली परीक्षा नारों, भाषणों और प्रतीकों से नहीं, बल्कि उनके अधिकारों, गरिमा, स्वतंत्रता और निर्णय-प्रक्रिया में भागीदारी के प्रति राजनीतिक दलों के वास्तविक रुख से होती है।
डॉ. सिंह ने कहा, “नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का यह कहना कि उनका भरोसा शिव-शक्ति में है, तब सवालों के घेरे में आ जाता है, जब मुंबई के मंच से वही राहुल गांधी ‘शक्ति’ से लड़ने की बात कहते हैं। शक्ति का नाम राजनीतिक सुविधा के अनुसार लेना और सुविधा बदलते ही अपना रुख बदल देना कांग्रेस की राजनीति के विरोधाभास को उजागर करता है।”
उन्होंने कहा कि एक महिला सांसद के विरुद्ध मौलाना की आपत्तिजनक टिप्पणी के मामले में कांग्रेस के कुछ नेताओं ने प्रतिक्रिया दी, लेकिन नेता प्रतिपक्ष की स्पष्ट और मुखर आवाज़ सुनाई नहीं दी। संसद के बाहर सवाल पूछे जाने पर उनका यह कहना कि “बोलूँगा तो सदन के अंदर बोलूँगा”, सवाल खड़े करता है। वहीं, मई 2026 में कांग्रेस सांसद गेनीबेन ठाकोर के मामले में राहुल गांधी की प्रतिक्रिया का उल्लेख करते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि महिला अपनी पार्टी की हो तो तत्काल आक्रोश और दूसरे मामले में चुप्पी—यह महिला-सम्मान का समान मानदंड नहीं, बल्कि चयनात्मक संवेदना का उदाहरण है।
डॉ. सिंह ने शाह बानो प्रकरण का उल्लेख करते हुए कहा कि 1986 में राजीव गांधी सरकार द्वारा बनाए गए कानून ने गुज़ारा भत्ते के अधिकार को लेकर गंभीर बहस खड़ी की थी। इसी मुद्दे पर तत्कालीन केंद्रीय मंत्री आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने इस्तीफ़ा दिया था। तीन तलाक के मुद्दे पर कांग्रेस के रुख पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के मामले में भी राजनीतिक दलों को वोट-बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर स्पष्ट और सुसंगत रुख अपनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय का वास्तविक अर्थ महिलाओं को बिना किसी भेदभाव के उनके अधिकार दिलाना है।
महिला आरक्षण के मुद्दे पर डॉ. सिंह ने कहा कि महिलाओं को विधायिकाओं में 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व देने की मांग दशकों से उठती रही है। उन्होंने 17 अप्रैल 2026 को महिला आरक्षण से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक पर हुई संसदीय कार्यवाही का उल्लेख करते हुए कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और डीएमके की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जो दल सार्वजनिक मंचों पर नारी-सशक्तीकरण की बात करते हैं, उन्हें महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने वाले प्रस्तावों पर अपने रुख का स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
कांग्रेस शासित राज्यों में महिला राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर सवाल उठाते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि कर्नाटक के मंत्रिमंडल में महिलाओं की अनुपस्थिति और हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार में महिला मंत्री का न होना गंभीर सवाल खड़े करता है। उन्होंने कहा कि महिलाओं के वोट और समर्थन की अपेक्षा करने वाले राजनीतिक दलों को सत्ता में उन्हें वास्तविक भागीदारी देने के सवाल पर भी जवाबदेह होना चाहिए। महिला-सशक्तीकरण का दावा तभी सार्थक है, जब महिलाओं को राजनीतिक निर्णय-प्रक्रिया में भी उचित स्थान मिले।
समाजवादी पार्टी पर निशाना साधते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि महिला-सम्मान के दावे करने वाली सपा का अतीत भी सवालों से मुक्त नहीं है। बलात्कार के मामलों में सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव की विवादास्पद टिप्पणी, 2019 में लोकसभा में तत्कालीन पीठासीन महिला सांसद रमा देवी के प्रति आज़म ख़ान की अशोभनीय टिप्पणी तथा महिला आरक्षण के प्रति पार्टी के ऐतिहासिक विरोध का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अखिलेश यादव को उत्तर प्रदेश की बेटियों के सामने अपनी पार्टी का रुख स्पष्ट करना चाहिए। महिलाओं की गरिमा और समान अधिकार किसी भी राजनीतिक दल की सुविधा पर निर्भर नहीं हो सकते।
डॉ. सिंह ने अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में कहा कि अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान द्वारा लड़कियों की शिक्षा और महिलाओं के रोजगार पर लगाए गए प्रतिबंध तथा 7 अक्टूबर के हमास हमले के दौरान महिलाओं के विरुद्ध यौन हिंसा और उन्हें बंधक बनाए जाने की घटनाओं पर भी मानवाधिकारों के प्रति समान रूप से मुखर आवाज़ उठनी चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी महिला को बुर्का या हिजाब पहनने के लिए बाध्य करना गलत है, तो उसकी व्यक्तिगत पसंद और स्वतंत्रता को कुचलना भी उतना ही गलत है। धार्मिक या राजनीतिक दबाव—किसी भी रूप में—महिलाओं की स्वतंत्रता का हनन नहीं होना चाहिए।
डॉ. सिंह ने कहा कि महिला हिंदू हो या मुस्लिम, सत्ता पक्ष की हो या विपक्ष की, उसकी गरिमा, सुरक्षा, शिक्षा, स्वतंत्रता और राजनीतिक भागीदारी के लिए एक समान मानदंड होना चाहिए। महिला-सशक्तीकरण का अर्थ केवल भाषणों में नारी-शक्ति का उल्लेख करना नहीं, बल्कि उसे अधिकार, अवसर, सम्मान और निर्णय लेने की वास्तविक शक्ति प्रदान करना है।
उन्होंने कहा, “शिव-शक्ति का नाम लेना आसान है, लेकिन नारी-शक्ति को अधिकार और अवसर देना असली परीक्षा है। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी को बताना होगा कि उनकी राजनीति महिलाओं के अधिकारों के साथ खड़ी है या वोट-बैंक के हितों के साथ। देश की नारी-शक्ति अब केवल नारे नहीं, बल्कि स्पष्ट जवाब और ठोस प्रतिबद्धता चाहती है।”