ब्राम्ह अनुभूति अखबार यूपी लाइव न्यूज 24 उत्तर प्रदेश
वरिष्ठ राष्ट्रीय संपादक अभिषेक उपाध्याय
दिल्ली हाई कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि किसी भी महिला के धर्म का निर्धारण केवल उसकी शादी के आधार पर नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि किसी हिंदू महिला का मुस्लिम पुरुष से विवाह करने से उसका धर्म खुद-ब-खुद इस्लाम में नहीं बदला जाता. कोर्ट ने यह टिप्पणी बंटवारे के मामले की सुनवाई के दौरान की. दिल्ली हाईकोर्ट ने साफ किया कि शादी से धर्म परिवर्तन का दावा तब तक नहीं किया जा सकता जब तक कि इसका ठोस प्रमाण न हो. हाइकोर्ट के सामने यह मामला 2007 में एक व्यक्ति की पहली पत्नी की बड़ी बेटी द्वारा दायर किया गया था. यह मुकदमा उस व्यक्ति और उसकी दूसरी पत्नी से हुए दो बेटों के खिलाफ था.लाइव लव की रिपोर्ट के अनुसार, मामला इस आधार पर दायर किया गया कि पहली पत्नी की बेटियां पिता द्वारा बनाए गए हिंदू अविभाजित परिवार की संपत्तियों में हिस्सा रखती हैं.
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2005 में हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम लागू होने के बाद, बेटियों को भी पारिवारिक संपत्ति में बराबर का अधिकार दिया गया. इस अधिनियम के तहत, पहली पत्नी की बेटियों ने संपत्ति में 1/5वें हिस्से का दावा किया. मुकदमे का विरोध करते हुए पिता और दूसरी पत्नी के बेटों ने दावा किया कि बड़ी बेटी हिंदू नहीं रही, क्योंकि उसने यूनाइटेड किंगडम में पाकिस्तानी मूल के मुस्लिम व्यक्ति से शादी कर ली थी. उनका तर्क था कि शादी के बाद वह इस्लाम में परिवर्तित हो चुकी है और इसलिए वह एच यू एफ की संपत्तियों में हिस्सा नहीं ले सकती.
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जस्टिस जसमीत सिंह ने कहा कि यह साबित करना बचाव पक्ष की जिम्मेदारी थी कि बड़ी बेटी ने हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम स्वीकार कर लिया है. कोर्ट ने पाया कि बचाव पक्ष कोई ठोस सबूत पेश करने में असफल रहा, जो यह दिखाए कि बड़ी बेटी ने धर्मांतरण की मान्यता प्राप्त प्रक्रिया से गुजरकर इस्लाम धर्म अपना लिया है. महिला ने अपने हलफनामे में साफ किया कि उसने अपने सिविल विवाह के बाद भी अपना धर्म नहीं बदला और वह हिंदू धर्म का पालन करती रही. कोर्ट ने कहा, ‘मुस्लिम व्यक्ति से शादी करने मात्र से हिंदू धर्म का स्वत: परित्याग नहीं होता. इस मामले में, बचाव पक्ष द्वारा केवल आरोप लगाए गए हैं, लेकिन कोई भी सबूत प्रस्तुत नहीं किया गया है.’
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कोर्ट ने यह भी कहा कि बड़ी बेटी हिंदू धर्म का पालन करती रही, इसलिए वह की संपत्तियों में अपने हिस्से की हकदार है. एच सी ने फैसला सुनाया कि बेटियां के नाम पर पब्लिक प्रोविडेंट फंड खाते में जमा राशि में से प्रत्येक को 1/4 हिस्से की हकदार होंगी. इसके अलावा, बेटों द्वारा दायर हलफनामे में यह साफ किया गया कि उन्होंने संपत्तियों पर अपने सभी अधिकार, टाइटल और हित पहली पत्नी की बेटियों के पक्ष में छोड़ दिए हैं. इसे ‘गुडविल जेस्चर’ के रूप में देखा गया.