यूपी लाइव न्यूज 24 उत्तर प्रदेश
ब्यूरो प्रमुख दुर्गेश अवस्थी
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस में शामिल हुए बीआरएस के कुछ विधायकों को अयोग्य ठहराने की मांग वाली याचिकाओं पर तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष के निर्णय लेने में कथित देरी के खिलाफ याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है. शीर्ष अदालत ने तेलंगाना हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश के आदेश को उचित ठहराया, जिसमें सत्तारूढ़ कांग्रेस में शामिल हुए बीआरएस विधायकों के बारे में अयोग्यता याचिकाओं को तेलंगाना अध्यक्ष के समक्ष रखने के लिए चार सप्ताह का समय निर्धारित किया गया था.
साथ ही अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट की खंडपीठ ने अनुचित आदेश पारित किया. मामले की सुनवाई जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ कर रही थी.
जस्टिस गवई ने तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता एएम सिंघवी से कहा, “मैंने मुकुल रोहतगी (जिन्होंने कल स्पीकर की पैरवी करते हुए बहस की थी) से कहा, यह ‘आ बैल मुझे मार’ की स्थिति है. अगर आपने (उच्च न्यायालय के) एकल न्यायाधीश के आदेश को स्वीकार कर लिया होता, तो यह नौबत नहीं आती. अगर आपने एकल न्यायाधीश के उचित आदेश को स्वीकार कर लिया होता, तो खंडपीठ के लिए ऐसा अन्यायपूर्ण आदेश पारित करने का कोई अवसर नहीं था, जिसके लिए हमें हस्तक्षेप करने की जरूरत है.”
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता और बीआरएस नेता पडी कौशिक रेड्डी की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता सीए सुंदरम ने सदन में तेलंगाना के मुख्यमंत्री के बयान की कॉपी का हवाला दिया और इसे चौंकाने वाला बताया.
इस पर सिंघवी ने कहा कि मुख्यमंत्री ने क्षणिक आवेश में यह बयान दिया और उकसावे की भावना थी: दूसरा पक्ष, विधानसभा में उठकर हंगामा कर रहा था. सुंदरम ने कहा कि बीआरएस विधायक ने तेलंगाना के मुख्यमंत्री को आगाह किया कि सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही पर चर्चा नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि मामला विचाराधीन है, लेकिन मुख्यमंत्री कहते हैं कि हमें जो कहना है, कहने का अधिकार है.
सुंदरम ने कहा कि जब मुख्यमंत्री ने विधानसभा में कहा कि उन्हें भविष्य में उपचुनावों के बारे में चिंता करने की जरूरत नहीं है और विपक्षी विधायक चाहें तो भी उपचुनाव नहीं होंगे, तो स्पीकर ने बिल्कुल भी हस्तक्षेप नहीं किया.
जस्टिस गवई ने कहा कि सिंघवी क्या आपके मुख्यमंत्री से कम से कम कुछ हद तक संयम बरतने की उम्मीद नहीं थी. सिंघवी ने कहा कि यह विधानसभा की कार्यवाही की चुनिंदा प्रतिलिपि है और पीठ से अनुरोध किया कि उसे इसकी जांच करने और उचित अनुवाद प्राप्त करने की अनुमति दी जाए.
पीठ शायद अलग मामले का जिक्र कर रही थी जिसमें शीर्ष अदालत ने पिछले साल रेड्डी की टिप्पणियों को अस्वीकार कर दिया था, जिसमें उन्होंने कथित दिल्ली आबकारी नीति घोटाले से जुड़े एक मामले में बीआरएस नेता के कविता को जमानत देने पर टिप्पणी की थी.
जस्टिस गवई ने कहा, “क्या हमने उन्हें इस तरह जाने देकर और अवमानना के लिए कार्रवाई न करके कोई गलती की… हम प्रतिक्रिया नहीं कर रहे हैं और हमें इस बात की परवाह नहीं है कि राजनेता क्या कहते हैं. लेकिन व्यक्ति ने ऐसी ही परिस्थितियों का सामना किया है, एक साल भी नहीं बीता है. हम लोकतंत्र के अन्य दो अंगों का सम्मान करते हैं, अन्य दो अंगों से भी यही अपेक्षा की जाती है.”
सिंघवी ने कहा कि उन्हें पूरी प्रतिलिपि मिलेगी. सुंदरम ने कहा कि सीएम कह रहे हैं कि वह स्पीकर की ओर से बयान दे रहे हैं और स्पीकर चुप हैं. उन्होंने कहा, “मैं उनसे इस मामले को उचित तरीके से खत्म करने की उम्मीद कैसे कर सकता हूं.”
जस्टिस गवई ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि डॉ. सिंघवी को महाराष्ट्र में इसी तरह की स्थिति का पहले से ही अच्छा अनुभव है. सिंघवी ने कहा कि मामले में उचित समय अभी नहीं आया है. पीठ ने पूछा, क्या अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय लेने के लिए एक वर्ष और दो महीने की अवधि उचित अवधि नहीं है?
पीठ ने पूछा कि दलबदल करने वाले विधायकों को अयोग्य ठहराने की मांग वाली याचिकाओं पर निर्णय लेने के लिए स्पीकर के लिए उचित अवधि क्या होगी. अदालत ने पूछा कि क्या अयोग्यता आवेदनों को ऐसे ही छोड़ दिया जाए और 10वीं अनुसूची, दलबदल विरोधी कानून को कूड़ेदान में फेंक दिया जाना चाहिए?
सुंदरम ने पीठ से अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय लेने के लिए समय सीमा निर्धारित करने का आग्रह किया. मामले की सुनवाई के बाद पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया.
शीर्ष अदालत कांग्रेस में शामिल हुए बीआरएस के 10 विधायकों को अयोग्य ठहराने की मांग करने वाले आवेदन पर तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष के निर्णय लेने में कथित देरी का मुद्दा उठाने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी. याचिकाकर्ताओं ने कांग्रेस में शामिल हुए 10 विधायकों के खिलाफ लंबित अयोग्यता कार्यवाही पर तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष द्वारा समय पर कार्रवाई की मांग की है.