यूपी लाइव न्यूज 24 उत्तर प्रदेश
सह संपादक कपिल गुप्ता
जालौन जनपद की कालपी तहसील अंतर्गत विकासखंड महेवा इन दिनों सुर्खियों में है—लेकिन विकास के लिए नहीं, बल्कि कथित भ्रष्टाचार के उस जाल के लिए, जिसने ग्राम पंचायत मडैया (मौया) को पूरे जिले में चर्चा का केंद्र बना दिया है।
यह मामला अब केवल आरोपों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नाम, रकम, दस्तावेज़ और डिजिटल रिकॉर्ड के साथ एक बड़े महाघोटाले की शक्ल ले चुका है।
शिकायतकर्ता जयनारायण सिंह पुत्र विश्वनाथ सिंह द्वारा लगाए गए आरोपों ने न सिर्फ ग्राम पंचायत की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे की निष्पक्षता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
केंद्र में कौन-कौन?
इस पूरे कथित घोटाले में जिन नामों पर सबसे ज्यादा उंगली उठ रही है, उनमें ग्राम प्रधान गोपालदास यादव, पंचायत सचिव अमर सिंह और खंड विकास अधिकारी संदीप मिश्रा प्रमुख बताए जा रहे हैं। आरोप है कि इनकी मिलीभगत से मनरेगा, ग्राम निधि और अन्य सरकारी योजनाओं में बड़े स्तर पर फर्जी भुगतान किए गए।
ग्रामीणों का दावा है कि विकास कार्यों के नाम पर कागजों में योजनाएं पूरी दिखाई गईं, लेकिन जमीन पर या तो काम अधूरा है या पूरी तरह नदारद।
सोनू गहपुरा—अचानक उभरा नाम, सवालों के घेरे में
इस पूरे प्रकरण में सबसे ज्यादा चर्चा जिस नाम को लेकर हो रही है, वह है कथित ठेकेदार सोनू गहपुरा। ग्रामीणों के अनुसार, कुछ साल पहले तक सामान्य जीवन जीने वाला यह युवक अचानक ब्लॉक स्तर पर सक्रिय हुआ और देखते ही देखते ठेकेदारी के बड़े कामों में शामिल हो गया।
जय महाकाल कॉन्ट्रैक्टर और काल भैरव कॉन्ट्रैक्टर जैसे नामों के तहत काम करने वाले सोनू पर आरोप है कि उसने ग्राम पंचायत से जुड़े कई कार्यों में हस्तक्षेप कर भुगतान की व्यवस्था को प्रभावित किया।
ग्रामीणों के मुताबिक आज उसकी संपत्ति में लग्जरी वाहन, उरई शहर में मकान और कई प्लॉट शामिल हैं।
साथ ही, उसके परिजनों के खातों में भी संदिग्ध लेन-देन की बात सामने आ रही है।
सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है—क्या यह सब वैध कमाई है या फिर सरकारी धन के दुरुपयोग का परिणाम?
एक ही काम पर कई बार भुगतान—डुप्लीकेट विकास का खेल?
शिकायत में दर्ज तथ्यों के अनुसार, ग्राम पंचायत में कई ऐसे कार्य हैं जिन पर एक ही वित्तीय वर्ष में दो-दो बार भुगतान किया गया। इनमें संतराम, कमल सिंह, श्रवण कुमार, किरन देवी और करन सिंह के खेतों पर बंधी निर्माण जैसे कार्य शामिल हैं।
आरोप है कि इन कार्यों के लिए अलग-अलग समय पर भुगतान दिखाकर सरकारी धन की निकासी की गई, जबकि मौके पर या तो काम अधूरा है या अस्तित्व में ही नहीं।
कागजों में सड़क, जमीन पर धूल
समतलीकरण, जलरोधक बांध, इंटरलॉकिंग और सीसी रोड जैसे कार्यों को लेकर भी गंभीर सवाल उठे हैं।
दस्तावेजों में इन कार्यों को पूर्ण दिखाया गया है, लेकिन ग्रामीणों का दावा है कि वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है।
“कागजों में विकास, जमीन पर सन्नाटा”—यह लाइन अब मडैया गांव की पहचान बनती जा रही है।
आईडी और ट्रांजैक्शन का खेल—डिजिटल सबूतों की आहट
शिकायत में 3138008031 सीरीज के तहत कई कार्यों पर संदिग्ध भुगतान का जिक्र है। IF और WC नंबर के जरिए इन लेन-देन को ट्रैक किया जा रहा है, जिससे यह मामला अब और भी गंभीर हो गया है।
सूत्रों के अनुसार, बैंक खातों की पूरी ट्रांजैक्शन डिटेल तैयार की जा रही है, जो अगली कड़ी में सामने आ सकती है।
जॉब कार्ड घोटाला—परिवार ही बना ‘मजदूर’
इस पूरे प्रकरण का सबसे चौंकाने वाला पहलू है जॉब कार्ड घोटाला। आरोप है कि ग्राम प्रधान और उनके परिजनों के नाम पर ही जॉब कार्ड बनाए गए और बिना मजदूरी किए भुगतान निकाल लिया गया।
जिन नामों का उल्लेख सामने आया है, उनमें खुद प्रधान गोपालदास यादव, उनके पुत्र, भाई, भतीजे और बेटियां शामिल हैं। इसके अलावा सचिव और अन्य कर्मचारियों के परिवारों के नाम भी सूची में बताए जा रहे हैं।
आरोप यह भी है कि एक ही व्यक्ति के नाम पर कई जॉब कार्ड बनाए गए, जिससे फर्जी हाजिरी लगाकर सरकारी धन की निकासी की गई।
आवास और हैंडपंप में भी गड़बड़ी के आरोप
प्रधानमंत्री आवास योजना और हैंडपंप रीबोर जैसे कार्य भी इस कथित घोटाले से अछूते नहीं रहे। शिकायत के अनुसार, रानी देवी को आवास का लाभ दिया गया, जबकि उनके पास पहले से पर्याप्त संसाधन मौजूद थे।
वहीं, सर्वेश कुमार के मामले में पैसा निकलने के बावजूद मकान अधूरा बताया जा रहा है।
हैंडपंप रीबोर के नाम पर वाउचर तो बनाए गए, लेकिन मौके पर काम नहीं हुआ।
भुगतान सीधे प्रधान के खाते में?
सबसे गंभीर आरोपों में यह भी शामिल है कि मजदूरी का पैसा सीधे ग्राम प्रधान के खाते में ट्रांसफर किया गया।
विभिन्न तिथियों पर हजारों से लेकर लाखों रुपये तक की एंट्री दर्ज बताई जा रही है।
सवाल उठता है—जब यह पैसा मजदूरों के लिए था, तो फिर यह प्रधान के खाते में कैसे पहुंचा?
दबंगई के आरोप—सच दबाने की कोशिश?
ग्रामीणों के बीच यह चर्चा भी तेज है कि इस पूरे मामले को दबाने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। कुछ स्थानीय लोगों का दावा है कि खुलासा करने वालों को धमकियां दी जा रही हैं और कानूनी कार्रवाई की बात कही जा रही है।
हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन क्षेत्र में इस तरह की चर्चाएं माहौल को और भी तनावपूर्ण बना रही हैं।
प्रशासन की भूमिका पर सवाल
यह मामला नया नहीं है। ग्रामीणों के अनुसार, शिकायतें पहले भी की गईं, जनसुनवाई में मामला दर्ज हुआ, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई।
अब सवाल यह है—क्या प्रशासन जानबूझकर चुप है?
क्या कहीं ऊपर तक सेटिंग है?
या फिर हर बार की तरह इस बार भी मामला ठंडे बस्ते में चला जाएगा?
ग्रामीणों का अल्टीमेटम—‘इस बार आर-पार’
गांव के लोगों ने साफ चेतावनी दी है कि यदि इस बार भी निष्पक्ष जांच और ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला जालौन से निकलकर लखनऊ तक गूंजेगा। सड़क से लेकर सदन तक विरोध की बात कही जा रही है।
अगली कड़ी—सबूतों का विस्फोट!
क्राइम रिपोर्टर सोनू महाराज के अनुसार, अगली रिपोर्ट में बैंक खातों की पूरी ट्रांजैक्शन चेन, फर्जी जॉब कार्ड का डिजिटल रिकॉर्ड, मस्टर रोल और भुगतान रजिस्टर की कॉपियां सार्वजनिक की जाएंगी।
इसके साथ ही ठेकेदार और अधिकारियों के बीच कथित कनेक्शन के भी प्रमाण सामने लाए जाएंगे।
निष्कर्ष: सिस्टम बनाम सच की लड़ाई
महेवा ब्लॉक का यह मामला अब सिर्फ एक गांव या एक पंचायत तक सीमित नहीं रहा। यह उस सिस्टम की साख पर सवाल है, जो गरीबों के लिए बनी योजनाओं को लागू करने का दावा करता है।
अगर आरोप सही हैं, तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि गरीबों के हक पर सीधा हमला है।
और अगर आरोप गलत हैं, तो सच्चाई सामने आनी चाहि