डॉ. राजेश्वर सिंह ने केंद्रीय विधि मंत्री से ‘भारतीय सिविल रॉन्ग्स एवं क्षतिपूर्ति संहिता’ लाने का आग्रह किया

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यूपी लाइव न्यूज़ 24 उत्तर प्रदेश

“भारत ने दंड देने वाले कानून को आधुनिक बनाया है। अब समय है कि क्षति की भरपाई करने वाले कानून को भी आधुनिक बनाया जाए।” : डॉ. राजेश्वर सिंह

लखनऊ: सरोजनीनगर के विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने माननीय केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री श्री अर्जुन राम मेघवाल जी को पत्र लिखकर एक व्यापक टॉर्ट कानून, “भारतीय सिविल रॉन्ग्स एवं क्षतिपूर्ति संहिता” लाने का आग्रह किया है। इसका उद्देश्य लापरवाही अथवा अन्य नागरिक क्षति से प्रभावित प्रत्येक नागरिक को समयबद्ध और उचित क्षतिपूर्ति सुनिश्चित करना है।

नए आपराधिक कानूनों के बाद अगला कदम

औपनिवेशिक आपराधिक कानूनों के स्थान पर BNS, BNSS और BSA लागू किए जाने के बाद अब पीड़ितों को क्षतिपूर्ति देने वाले सिविल कानूनों में भी सुधार आवश्यक है। दोषी को दंड देना पर्याप्त नहीं है; जिस व्यक्ति को नुकसान हुआ है, उसके जीवन को यथासंभव पुनर्स्थापित करना भी न्याय का हिस्सा होना चाहिए।

सात दशकों से अधूरा सुधार

प्रथम विधि आयोग ने अपनी पहली रिपोर्ट में ही वर्ष 1956 में राज्य की दायित्व-निर्धारण व्यवस्था पर कानून बनाने की सिफारिश की थी। वर्ष 1965 और 1967 में पेश किए गए विधेयक आगे नहीं बढ़ सके। आज भी भारत में सिविल रॉन्ग्स के संबंध में कोई व्यापक कानून नहीं है। गलत तरीके से हुई मृत्यु से जुड़े दावे आज भी औपनिवेशिक काल के Fatal Accidents Act, 1855 के अंतर्गत आते हैं।

प्रभावी कानूनी उपायों से वंचित पीड़ित

वर्ष 2023 में भारत में 4.8 लाख से अधिक सड़क दुर्घटनाएं और 1.72 लाख मौतें दर्ज की गईं। इसके बावजूद गड्ढों, खुले नालों अथवा खराब डिजाइन जैसी लापरवाहियों के लिए सड़क एजेंसियों और ठेकेदारों की जवाबदेही सीमित रहती है। नवंबर 2025 तक साइबर फ्रॉड में लगभग ₹20,000 करोड़ की राशि के नुकसान की बात सामने आई, जिसमें लगभग ₹8,000 करोड़ ही बचाया या फ्रीज किया जा सका। डेटा ब्रीच के पीड़ितों के लिए भी क्षतिपूर्ति का स्पष्ट वैधानिक अधिकार नहीं है।

विश्व के कई देशों में प्रभावी व्यवस्था

यूके, अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, जापान और चीन में राज्य तथा निजी संस्थाओं द्वारा होने वाली क्षति के लिए दायित्व तय करने वाले कानूनी ढांचे मौजूद हैं। यूरोपीय संघ ने AI सिस्टम और सॉफ्टवेयर को उत्पाद दायित्व के दायरे में लाने की दिशा में भी नियम बनाए हैं।

आम नागरिक को स्पष्ट समाधान

प्रस्तावित संहिता नागरिकों को पांच महत्वपूर्ण सवालों के स्पष्ट उत्तर देगी—किसके विरुद्ध दावा किया जा सकता है, कहां दावा किया जाए, कितने समय में दावा किया जाए, कितनी क्षतिपूर्ति मांगी जा सकती है और निर्णय होने तक अंतरिम राहत क्या उपलब्ध होगी। इसमें चिकित्सा लापरवाही, खराब सड़क एवं भवन, औद्योगिक दुर्घटनाएं, डीपफेक, डेटा ब्रीच और पुलिस की ज्यादती जैसे मामलों को शामिल किया जा सकता है।

अधिक जवाबदेह प्रशासन

विभागों को दावों पर निर्धारित समयसीमा में जवाब देना अनिवार्य किया जा सकता है। ईमानदारी और सद्भावना से कार्य करने वाले अधिकारियों को संरक्षण मिले, जबकि दुर्भावना अथवा घोर लापरवाही सिद्ध होने पर संबंधित अधिकारियों से क्षतिपूर्ति की वसूली की व्यवस्था हो सकती है। यह व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट के LDA v. M.K. Gupta जैसे स्थापित न्यायिक सिद्धांतों के अनुरूप हो सकती है। विभागों द्वारा दावों का वार्षिक डेटा प्रकाशित करने से बार-बार होने वाली प्रशासनिक कमियों की पहचान और सुधार में भी मदद मिलेगी।

सुरक्षा उपाय और आगे की राह

प्रस्ताव में झूठे एवं निराधार दावों के विरुद्ध सुरक्षा, सद्भावना से लिए गए निर्णयों का संरक्षण, किफायती ऑनलाइन समाधान व्यवस्था तथा मुकदमेबाजी से पहले मध्यस्थता जैसे प्रावधान शामिल किए जा सकते हैं। डॉ. सिंह ने इस विषय को भारतीय विधि आयोग को भेजकर समयबद्ध रिपोर्ट प्राप्त करने तथा इसके बाद विशेषज्ञ समिति और राष्ट्रव्यापी परामर्श की प्रक्रिया शुरू करने का आग्रह किया है।

“जहां क्षति हुई है, वहां न्याय का अर्थ केवल निर्णय सुनाना नहीं, बल्कि पीड़ित को यथासंभव पुनर्स्थापित करना भी होना चाहिए।” : डॉ. राजेश्वर सिंह

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