यूपी लाइव न्यूज़ 24 उत्तर प्रदेश
अयोध्या में आयोजित श्री गुरु पर्व महामहोत्सव एवं संत सम्मेलन में सम्मिलित हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने संबोधन में कहा उदासीन परंपरा सनातन धर्म की वह जीवंत धारा है, जिसने सदियों से भारत की आध्यात्मिक चेतना को पोषित किया है।
भारत की सभ्यता की एक बड़ी विशेषता यह रही है, कि यहाँ ज्ञान को केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रखा गया। ज्ञान को परम्परा बनाया गया। उस परम्परा को संस्कार बनाया गया। और फिर संस्कार को, शिक्षा के माध्यम से, समाज के व्यवहार में उतारा गया।
शिक्षा किसी भी सभ्यता की रीढ़ होती है। और जब शिक्षा का माध्यम संस्कृत जैसी देवभाषा हो, तो उसका महत्व और भी बढ़ जाता है। आज जिस श्री नारायण संस्कृत महाविद्यालय को मैंने देखा, उसकी स्थापना, 1912 में बाबा श्री केशवराम जी महाराज ने की थी। यह हर्ष का विषय है कि उस परम्परा को, आज तक यहाँ के संत, यहाँ के आचार्य निभा रहे हैं।
मैं इस अवसर पर, श्री महंत डॉ० स्वामी भरत दास जी महाराज को हृदय से बधाई देता हूँ। उनके नेतृत्व में यह आश्रम निरंतर प्रगति केपथ पर अग्रसर है।
ये जो पूरी परम्परा है, इसका एक महत्वपूर्ण आधार संस्कृत है। संस्कृत को केवल एक भाषा नहीं समझा जाना चाहिए। संस्कृत के पास भारत की ज्ञान-परम्परा का एक विशाल भंडार है। वेदों से लेकर उपनिषद तक, दर्शन से लेकर व्याकरण तक, आयुर्वेद से लेकर गणित तक, ज्योतिष से लेकर साहित्य तक, न्याय से लेकर मीमांसा तक, भारतीय ज्ञान-परम्परा का एक बड़ा हिस्सा, संस्कृत के माध्यमसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा, और विश्व की बौद्धिक परंपराओं को इसने समृद्ध किया है।