यूपी लाइव न्यूज़ 24 उत्तर प्रदेश
लखनऊ। लैटरल एंट्री को लेकर समाजवादी पार्टी द्वारा किए जा रहे विरोध पर सरोजनीनगर विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने तीखा राजनीतिक हमला बोलते हुए कहा कि सपा का ‘मेरिट’ और ‘प्रोसेस’ प्रेम उसकी राजनीतिक सुविधा के अनुसार बदलता रहा है। उन्होंने कहा कि जब नियुक्तियां अपने राजनीतिक नेटवर्क के अनुकूल हों तो प्रक्रिया और योग्यता पर सवाल नहीं उठते, लेकिन जब देशहित में विशेषज्ञता को शासन से जोड़ा जाता है तो वही व्यवस्था लोकतंत्र पर हमला बताई जाने लगती है।
डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि उत्तर प्रदेश की जनता सपा शासन के उस दौर को नहीं भूली है, जब तत्कालीन सरकार ने अनिल यादव को UPPSC का अध्यक्ष नियुक्त किया था, जबकि उनके विरुद्ध 17 आपराधिक मामले दर्ज होने की बात सामने आई थी, जिनमें डकैती जैसे गंभीर आरोप भी शामिल थे। उनके कार्यकाल में PCS साक्षात्कारों में कथित पक्षपात के आरोप उठे और मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा। उन्होंने कहा कि जिस पार्टी के शासनकाल में ऐसी नियुक्तियों पर गंभीर सवाल उठे, उसका आज लैटरल एंट्री के नाम पर ‘मेरिट’ और ‘प्रक्रिया’ की दुहाई देना राजनीतिक पाखंड से अधिक कुछ नहीं है।
उन्होंने कहा कि सपा स्वयं बार-बार नौकरशाही को जड़, धीमी और जनता की बदलती जरूरतों के प्रति कम responsive बताती रही है। ऐसे में जब शासन में नई विशेषज्ञता, नए विचार और व्यावसायिक अनुभव लाने का प्रयास किया जाता है, तो उसका विरोध क्यों?
लैटरल एंट्री के पक्ष में पांच प्रमुख आधार:
1. विश्व स्तर पर स्थापित व्यवस्था है — ब्रिटेन नीति-निर्माण की भूमिकाओं में वरिष्ठ विशेषज्ञों की नियुक्ति करता है; अमेरिका में प्रत्येक प्रशासनिक बदलाव के साथ हजारों बाहरी विशेषज्ञों की नियुक्ति होती है; सिंगापुर की technocratic efficiency आंशिक रूप से सरकार में private-sector talent पर निर्भर करती है; न्यूजीलैंड में वरिष्ठ पदों के लिए बाहरी उम्मीदवारों को भी खुले तौर पर अवसर दिया जाता है।
2. विशेषज्ञता वास्तविक कमियों को पूरा करती है — एक generalist exam fintech, climate policy, semiconductors या cybersecurity जैसे क्षेत्रों में गहरी विशेषज्ञता पैदा नहीं कर सकता। लैटरल एंट्री ऐसे professionals को लाती है, जिनके पास पहले से यह विशेषज्ञता मौजूद है।
3. गति महत्वपूर्ण है — नीति संबंधी चुनौतियां नौकरशाही की promotion cycles से कहीं अधिक तेजी से बदलती हैं। लैटरल एंट्री दशकों के बजाय महीनों में विशेषज्ञता उपलब्ध कराती है।
4. भारत का अपना इतिहास भी इसका प्रमाण है — डॉ. मनमोहन सिंह (1971) और श्री सैम पित्रोदा (1980s) दोनों UPSC के बाहर से सार्वजनिक सेवा में आए और आगे चलकर राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह पहले से ही भारत के institutional history का हिस्सा है।
5. यह परीक्षा व्यवस्था को पूरक बनाती है, उसका स्थान नहीं लेती — इसका लक्ष्य विशिष्ट senior technical posts हैं, UPSC को bypass करना नहीं। दोनों व्यवस्थाएं साथ-साथ चल सकती हैं, जिसमें transparency और reservation के safeguards सुनिश्चित किए जा सकते हैं।
डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि असली सवाल यह नहीं है कि लैटरल एंट्री होनी चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि क्या भारत को तेजी से बदलती और अधिक जटिल होती चुनौतियों के दौर में विशेषज्ञता के लिए केवल एक ही मार्ग तक सीमित रहना चाहिए।
उन्होंने कहा, “उत्तर प्रदेश में भी हम लगातार इसी सिद्धांत की वकालत करते रहे हैं। हमने माननीय मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी के समक्ष AI Commission, State Transformation Commission, Youth Council जैसे संस्थानों में domain experts को शामिल करने का सुझाव दिया है। साथ ही हमारा स्पष्ट मत है कि Technical Departments के Secretary जैसे महत्वपूर्ण पदों पर उन्हीं क्षेत्रों की वास्तविक विशेषज्ञता रखने वाले अधिकारियों और विशेषज्ञों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, ताकि specialized knowledge सीधे नीति निर्माण और बेहतर governance में योगदान दे सके।”
डॉ. सिंह ने कहा कि राजनीतिक विरोध लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन राजनीतिक सुविधा के अनुसार ‘मेरिट’, ‘प्रक्रिया’ और ‘पारदर्शिता’ की परिभाषा बदलना स्वीकार्य नहीं हो सकता।
“लैटरल एंट्री पर बहस होनी चाहिए, safeguards पर चर्चा होनी चाहिए और चयन प्रक्रिया को और मजबूत किया जाना चाहिए—लेकिन विशेषज्ञता के दरवाजे बंद करने की राजनीति देशहित में नहीं है। भारत को ऐसी शासन व्यवस्था चाहिए जो अनुभव, योग्यता, विशेषज्ञता और पारदर्शिता—चारों को साथ लेकर चले।”