मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुई प्रदेश की राज्यपाल ने त्यागी व्रती जनों को किया सम्मानित

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यूपी लाइव न्यूज़ 24 उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश की राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल ने आज जन भवन, लखनऊ के गांधी सभागार में आयोजित ‘क्षमावाणी पर्व एवं त्यागी व्रती सम्मान, मिच्छामि दुक्कडम’ कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में सहभागिता की। इस अवसर पर राज्यपाल जी ने त्यागी व्रतीजनों को सम्मानित किया।
कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए राज्यपाल जी ने कहा कि ईश्वर ने मनुष्य को धरती पर किसी उद्देश्य के लिए भेजा है। मनुष्य का शरीर भी किसी अपेक्षा के साथ मिला है। उन्होंने कहा कि प्रेम, ज्ञान, क्षमा, संवेदनशीलता और सहिष्णुता को जीवन में स्थापित करने से जीवन सुंदर बनता है।
राज्यपाल जी ने कहा कि क्षमा केवल एक शब्द नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की वह अमूल्य निधि है, जो टूटे हुए संबंधों को जोड़ती है, मन के मैल को धोती है और अहंकार के अंधकार में करुणा का दीप प्रज्वलित करती है। जैन दर्शन ने संसार को यह अनुपम संदेश दिया है कि मनुष्य की वास्तविक विजय किसी दूसरे पर विजय पाने में नहीं, बल्कि स्वयं के क्रोध, अहंकार, लोभ और मोह पर विजय प्राप्त करने में है। उन्होंने कहा कि हमारे त्यागी व्रतीजन इसी आत्मविजय की सजीव प्रतिमूर्ति हैं।
राज्यपाल जी ने कहा कि त्यागी व्रतीजनों ने सुविधाओं का नहीं, साधना का मार्ग चुना है; संग्रह का नहीं, त्याग का पथ अपनाया है तथा भौतिक आकर्षणों से ऊपर उठकर आत्मकल्याण की ज्योति को प्रज्वलित रखा है। ऐसे तपस्वी, त्यागी व्रतीजनों का सम्मान करना त्याग की परंपरा, संयम की संस्कृति और आत्मशुद्धि के आदर्शों को नमन करना है।
उन्होंने कहा कि भारत एक जीवंत संस्कृति है और विविधताओं का उत्सव है। यहाँ अनेक धर्म, परंपराएं और विचारधाराएं हैं, लेकिन इन सबका मूल भाव ‘सर्व धर्म समभाव’ है। यही भारत की पहचान और शक्ति है। भारत की भूमि विविध विचारों की तपोभूमि रही है और हर युग में ऐसे दर्शन जन्मे हैं, जिन्होंने मानवता को दिशा दी। जैन धर्म भी उनमें से एक है।
राज्यपाल जी ने कहा कि जैन धर्म ने देश और दुनिया को अहिंसा का संदेश दिया, सत्य का मार्ग दिखाया तथा संयम और साधना की प्रेरणा दी। ये मूल्य आज के समय में पूरे विश्व के लिए मार्गदर्शक बन सकते हैं। भारत की आत्मा को समझने के लिए जैन धर्म के मूल सिद्धांत ‘अहिंसा परमो धर्मः’ को समझना आवश्यक है। यह भारत के नैतिक जीवन का आधारस्तंभ रहा है और इसने व्यक्तिगत आचरण के साथ-साथ राष्ट्र के चरित्र को भी गढ़ा है।
उन्होंने कहा कि इतिहास साक्षी है कि जैन धर्म की अहिंसा की भावना ने अनेक महापुरुषों को प्रेरित किया। महात्मा गांधी के सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों में भी जैन दर्शन की गहरी छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। इस प्रकार जैन धर्म ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को भी नैतिक दिशा प्रदान की।
राज्यपाल ने जैन धर्म के अनेकांतवाद सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि यह हमें सिखाता है कि सत्य एक रंग का नहीं होता, बल्कि इंद्रधनुष की भाँति बहुरंगी होता है। सत्य को अनेक दृष्टिकोणों से समझा जा सकता है। यही विचार भारत के बहुलतावादी समाज की आत्मा है।
उन्होंने कहा कि साहित्य, कला और वास्तुकला के क्षेत्र में भी जैन धर्म का प्रभाव अद्वितीय है। जैन मंदिरों की भव्यता, सूक्ष्म नक्काशी और आध्यात्मिक गरिमा भारतीय शिल्पकला की उत्कृष्टता के प्रतीक हैं। दिलवाड़ा के मंदिर और श्रवणबेलगोला की शांत प्रतिमाएं जैन धर्म के सौंदर्यबोध और आध्यात्मिकता के जीवंत प्रमाण हैं।
राज्यपाल जी ने कहा कि आर्थिक और सामाजिक जीवन में भी जैन धर्म ने संयम और नैतिकता का संदेश दिया है। अपरिग्रह, अर्थात आवश्यकता के अनुसार ही संग्रह करने का सिद्धांत, आज के उपभोक्तावादी युग में भी अत्यंत प्रासंगिक है। यह हमें सिखाता है कि सच्चा सुख वस्तुओं के संग्रह में नहीं, बल्कि संतोष में निहित है।
उन्होंने कहा कि आज जब हम ‘विकसित भारत’ के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहे हैं, तब अपनी आध्यात्मिक विरासत से भी शक्ति लेने की आवश्यकता है। भारत की ताकत केवल उसकी अर्थव्यवस्था या तकनीक में नहीं, बल्कि उसकी संस्कृति, संस्कार और दर्शन में भी है। ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास’ की भावना में भी यही भारतीय दर्शन निहित है, सामूहिक प्रगति, नैतिकता और आत्मनियंत्रण।
राज्यपाल जी ने कहा कि आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी महान परंपराओं को केवल स्मरण न करें, बल्कि उन्हें अपने जीवन में उतारें। जब व्यक्ति बदलेगा, तब समाज बदलेगा और जब समाज बदलेगा, तब राष्ट्र नई ऊँचाइयों को प्राप्त करेगा।
उन्होंने कहा कि जैन इंटरनेशनल ट्रेड ऑर्गनाइजेशन द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम इस बात का सुंदर उदाहरण है कि व्यापार और अध्यात्म, आधुनिकता और संस्कार तथा समृद्धि और संवेदना एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं। हमारे जीवन में धन आए, लेकिन धन के साथ धर्म भी रहे। व्यवसाय बढ़े, लेकिन विनम्रता भी बढ़े। प्रतिष्ठा मिले, लेकिन परोपकार भी साथ चले। जीवन की यात्रा जितनी ऊँचाई प्राप्त करे, उतनी ही गहराई से हम अपनी जड़ों, संस्कारों और मानवीय मूल्यों से जुड़े रहें।
राज्यपाल जी ने ‘मिच्छामी दुक्कडम’ के संदेश को आत्मशुद्धि का मार्ग बताते हुए कहा कि जो बीत गया, उसे स्मृति का बोझ न बनाएं। जिसने हमें दुख दिया, उसे क्षमा करें और जिसे हमने दुख दिया, उससे क्षमा माँगें। सबसे बढ़कर स्वयं को भी क्षमा करना सीखें।
उन्होंने कहा कि जैन परंपरा का अत्यंत पवित्र संदेश ‘मिच्छामी दुक्कडम’ है। इसका भाव है कि मन, वचन अथवा काया से जाने-अनजाने हुई किसी भी भूल या अपराध के लिए हृदय से क्षमा माँगना। यह केवल किसी से ‘माफ कर दीजिए’ कह देना नहीं, बल्कि भीतर से प्रतिशोध की गाँठ खोल देना है। जब तक मन में वैर है, तब तक वाणी की मधुरता अधूरी है।
राज्यपाल जी ने कहा कि मन निर्मल हो, वचन मधुर हों, कर्म पवित्र हों और आत्मा प्रकाशमय हो, यही क्षमावाणी का संदेश है, यही आत्मशुद्धि का मार्ग है और यही मानव जीवन की सच्ची विजय है।
राज्यपाल जी ने जन भवन में किए जा रहे विभिन्न नवाचारों और जनकल्याणकारी गतिविधियों की जानकारी देते हुए बताया कि जन भवन में संचालित आदर्श माध्यमिक विद्यालय में वंचित परिवारों के 422 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। जन भवन में कार्यरत अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने घर-घर जाकर जागरूकता अभियान चलाया और इन बच्चों का विद्यालय में नामांकन कराया। इन बच्चों की शिक्षा के साथ-साथ उनके सर्वांगीण विकास पर भी ध्यान दिया जा रहा है।
राज्यपाल जी ने बताया कि जन भवन में गौ सेवा का कार्य भी किया जाता है। बाहर से आने वाले तथा जन भवन में निवास करने वाले बच्चे गायों के पास जाते हैं और उन्हें गुड़-रोटी खिलाकर गौ सेवा करते हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों को सेवा, करुणा और संवेदनशीलता के संस्कार देने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण पहल है।
उन्होंने बताया कि जन भवन में स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं का भी विशेष ध्यान रखा जाता है। यहां कार्यरत अधिकारियों, कर्मचारियों तथा बच्चों का समय-समय पर स्वास्थ्य परीक्षण कराया जाता है और आवश्यकता पड़ने पर उपचार किया जाता है।
राज्यपाल जी ने जन भवन में पर्यावरण संरक्षण के लिए किए जा रहे कार्यों का उल्लेख करते हुए बताया कि परिसर में लगभग 20,000 पौधे लगाए गए हैं। यहां बोनसाई गार्डन भी विकसित किया गया है। जन भवन का परिसर हरियाली से परिपूर्ण है, जहां लोग प्रातः एवं सायंकाल टहलने आते हैं। उन्होंने बताया कि वर्षभर जन भवन में विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं तथा हजारों स्कूली बच्चे शैक्षणिक भ्रमण के लिए यहां आते हैं।
राज्यपाल जी ने बताया कि जन भवन में विभिन्न प्रकार की खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन भी किया जाता है, जो लगभग दो माह तक चलता है और जिसमें बड़ी संख्या में लोग प्रतिभाग करते हैं। इन विभिन्न गतिविधियों का लाभ सभी को मिलता है।
राज्यपाल जी ने उपस्थित सभी अतिथियों से आह्वान किया कि वे जन भवन का भ्रमण करें और अपने बच्चों को भी जन भवन की विभिन्न गतिविधियों एवं यहां किए जा रहे नवाचारों से परिचित कराएं, ताकि उन्हें सेवा, संस्कार, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक दायित्व की प्रेरणा मिल सके।
इस अवसर पर राज्यपाल जी ने जैन इंटरनेशनल ट्रेड ऑर्गनाइजेशन के समस्त आयोजकों को इस अनुपम आयोजन के लिए हार्दिक साधुवाद एवं शुभकामनाएँ दीं तथा मंगलकामना की कि यह आयोजन निरंतर जन-जन में क्षमा, संयम, करुणा और सद्भाव की ज्योति प्रज्वलित करता रहे।

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