यूपी लाइव न्यूज 24 उत्तर प्रदेश
मुख्य संपादक प्रवीण सैनी लखनऊ
जब युवाओं के भविष्य, देश की सुरक्षा और करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था—तीनों पर एक साथ सवाल खड़े हों, तो यह सरकार की विफल कार्यप्रणाली और जवाबदेही के संकट का प्रमाण है
नीट जैसी महत्वपूर्ण परीक्षाओं में बार-बार हो रहा पेपर लीक पूरी शिक्षा व्यवस्था की विफलता है। आज लाखों युवा महंगी कोचिंग, वर्षों की कठिन मेहनत और अपने परिवारों की गाढ़ी कमाई दांव पर लगाकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन हर बार पेपर लीक उनकी मेहनत और सपनों पर पानी फेर देता है। जबकि ओवरएज होने पर उनका पूरा भविष्य दांव पर लग जाता है।
एक ओर सरकार की विफल नीतियाँ युवाओं को निराशा और अनिश्चितता की ओर धकेल रही हैं, तो दूसरी ओर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष आदरणीय श्री राहुल गांधी जी ने शिक्षा व्यवस्था एवं प्रतियोगी परीक्षाओं में व्यापक सुधार के उद्देश्य से “छात्रों की गूंज” अभियान की शुरुआत कोटा महारैली से की है। उनका स्पष्ट मानना है कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था असफलता के चरम पर पहुँच चुकी है, जहाँ प्रत्येक 1,000 छात्रों में से केवल 12 छात्रों को नियमित वेतन वाली नौकरी मिल पाती है, जबकि बड़ी संख्या में युवा बेरोजगारी, असुरक्षित रोजगार, कर्ज, नशे और निराशा की ओर धकेले जा रहे हैं।
राहुल गांधी जी ने कहा कि “छात्रों की गूंज” अभियान के माध्यम से ऐसी नई शिक्षा व्यवस्था की नींव रखी जाएगी, जिसमें देशभर के छात्रों की भागीदारी सुनिश्चित हो तथा प्रत्येक छात्र को बड़े सपने देखने, उन्हें साकार करने और उसकी आर्थिक क्षमता के अनुरूप गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिल सके। उन्होंने कोटा में छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि वर्तमान व्यवस्था में प्रत्येक 3,000 प्रतियोगी अभ्यर्थियों में केवल 1 आईएएस बनता है, लगभग 30 छात्र आईआईटी में प्रवेश पाते हैं और लगभग 180 छात्र डॉक्टर बनते हैं, जबकि शेष छात्रों को यह व्यवस्था अस्वीकार कर देती है। उन्होंने इसे “रिजेक्शन सिस्टम” की संज्ञा दी।
उन्होंने कहा कि एनटीए के अधीन सभी प्रमुख प्रतियोगी परीक्षाएँ लाए जाने से यदि किसी एक परीक्षा में गड़बड़ी होती है, तो उसका प्रभाव एक साथ लाखों छात्रों पर पड़ता है। राहुल गांधी जी के अनुसार, नीट और सीबीएसई से जुड़े घोटाले शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त व्यापक भ्रष्टाचार का केवल एक हिस्सा हैं तथा पूरी शिक्षा व्यवस्था निजीकरण, केंद्रीकरण और व्यावसायीकरण की चपेट में आ चुकी है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के कार्यकाल में शिक्षा बजट में भारी कटौती की गई है। एक दशक पहले शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 4.7 प्रतिशत खर्च किया जाता था, जो घटकर 2.4 प्रतिशत रह गया है। वर्ष 2005 में लगभग 71 प्रतिशत बच्चे सरकारी विद्यालयों में पढ़ते थे, जबकि आज यह संख्या घटकर लगभग 49 प्रतिशत रह गई है। इस दौरान लगभग एक लाख सरकारी विद्यालय बंद हुए और लगभग 50 हजार निजी विद्यालय खोले गए। आज देश के प्रत्येक 100 कॉलेजों में से लगभग 80 निजी क्षेत्र के हैं, लगभग 10 लाख शिक्षकों के पद रिक्त हैं तथा वर्ष 2024-25 में 98,592 सरकारी विद्यालयों में केवल एक शिक्षक कार्यरत है।
ऑपरेशन सिंदूर को लेकर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जी द्वारा संसद में दिए गए बयान और बाद में सरकार द्वारा सार्वजनिक की गई शहीद जवानों की सूची के बीच दिखाई देने वाला विरोधाभास देश के सामने गंभीर प्रश्न खड़े करता है। लोकतंत्र के सर्वोच्च सदन में दिए गए प्रत्येक बयान की विश्वसनीयता सर्वोपरि है। यदि दोनों में अंतर दिखाई देता है, तो इसकी निष्पक्ष जांच कर देश के सामने वास्तविक स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।
आज केवल युवाओं के भविष्य और देश की सुरक्षा ही नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था भी गंभीर सवालों के घेरे में है। करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास और जनसहयोग से बने श्रीराम मंदिर में चढ़ावे और दान के संबंध में उठ रहे प्रश्न केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रामभक्तों की भावनाओं से जुड़े हैं। आस्था के नाम पर देशभर के लोगों ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार योगदान दिया है, इसलिए प्रत्येक रुपये, प्रत्येक चढ़ावे और प्रत्येक योगदान का पारदर्शी एवं सार्वजनिक हिसाब देना सरकार और संबंधित ट्रस्ट की नैतिक जिम्मेदारी है।
इन्हीं महत्वपूर्ण मुद्दों को लेकर आज रायबरेली स्थित जिला कांग्रेस कार्यालय एवं अमेठी जिला कांग्रेस कार्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता को संबोधित कर केंद्र सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न उठाए तथा शिक्षा व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े मामलों में जवाबदेही, पारदर्शिता एवं निष्पक्ष जांच की मांग की।