बहुजन संवाद: संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय की रक्षा के लिए 18 अक्टूबर को राष्ट्रीय मंथन

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यूपी लाइव न्यूज़ 24 उत्तर प्रदेश

बहुजन कर्मचारी, सामाजिक कार्यकर्ता और चिंतक करेंगे राष्ट्रीय संवाद; जनआंदोलन की दिशा में लिया जाएगा बड़ा फैसला : डॉ. उदित राज

नई दिल्ली, 16 अक्टूबर 2026।

दलित, ओबीसी, माइनॉरिटीज और आदिवासी संगठनों के परिसंघ (डोमा परिसंघ) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व सांसद डॉ. उदित राज ने बताया कि 18 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली के एनडीएमसी कन्वेंशन सेंटर में देशभर के बहुजन कर्मचारी, सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी और चिंतक राष्ट्रीय संवाद में भाग लेंगे। इस संवाद में संविधान, लोकतंत्र, आरक्षण, सामाजिक न्याय और बहुजन समाज के भविष्य से जुड़े गंभीर सवालों पर विचार-विमर्श किया जाएगा तथा राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा फैसला लिया जाएगा।
डॉ. उदित राज ने कहा कि जिस तरह से चुनावी प्रक्रिया में कथित वोट चोरी और हेरफेर के आरोप सामने आ रहे हैं, उससे लोकतंत्र के साथ-साथ नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों और राजनीतिक अस्तित्व पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। ऐसे समय में नागरिक समाज का मौन रहना न केवल अपने अधिकारों से समझौता करना है, बल्कि देश और संविधान के प्रति अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटना भी है।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब देश के युवा, विद्यार्थी, वकील, पत्रकार और जागरूक नागरिक संविधान तथा लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तब बहुजन समाज उदासीन कैसे रह सकता है?

उन्होंने कहा, “पिछले लोकसभा चुनाव में संविधान बचाने की लड़ाई वोट के माध्यम से लड़ी गई और उसमें कुछ सफलता भी मिली। लेकिन अब संघर्ष को केवल चुनाव तक सीमित नहीं रखा जा सकता। संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरकर व्यापक जनआंदोलन खड़ा करना होगा।”
संसद और न्यायपालिका से निराशा, जनआंदोलन ही विकल्प
डॉ. उदित राज ने संसद और न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि संसद में लगातार गतिरोध के कारण देश के महत्वपूर्ण मुद्दों पर सार्थक चर्चा नहीं हो पा रही है। कभी-कभार कोई जनप्रतिनिधि आवाज उठाता भी है, तो उसका अपेक्षित प्रभाव दिखाई नहीं देता।
उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के बावजूद अनेक महत्वपूर्ण संवैधानिक सवालों पर अपेक्षित राहत नहीं मिल रही है। उच्च न्यायपालिका में जातिवाद, भाई-भतीजावाद और पारदर्शिता के अभाव को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। न्यायाधीशों की नियुक्ति की मौजूदा व्यवस्था में सामाजिक प्रतिनिधित्व और जवाबदेही सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।
डॉ. उदित राज ने सवाल किया, “आखिर उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति किस पारदर्शी और प्रतिस्पर्धात्मक प्रक्रिया से होती है? क्या उनकी नियुक्ति किसी खुली परीक्षा या सार्वजनिक चयन प्रक्रिया के माध्यम से होती है? जब देश की सर्वोच्च संस्थाओं में ही सामाजिक विविधता और पारदर्शिता का अभाव होगा, तो आम नागरिक न्याय की उम्मीद किससे करेगा?”
उन्होंने कहा कि न्यायपालिका का दायित्व संविधान और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना है। लेकिन जब संवैधानिक संस्थाओं की निष्क्रियता पर सवाल उठाने वालों को ही कठघरे में खड़ा किया जाने लगे, तो लोकतंत्र के भविष्य को लेकर चिंता स्वाभाविक है।
“जब संसद में जनता की आवाज बेअसर होने लगे और न्यायपालिका से भी अपेक्षित न्याय न मिले, तब लोकतांत्रिक एवं शांतिपूर्ण जनआंदोलन ही परिवर्तन का सबसे प्रभावी रास्ता बचता है।”
जातीय विभाजन और अवसरवादी नेतृत्व पर तीखा प्रहार

डॉ. उदित राज ने बहुजन समाज के भीतर बढ़ते जातीय विभाजन और कुछ दलित नेताओं की अवसरवादी राजनीति पर भी तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि कुछ नेता दलित समाज की जातीय भावनाओं का इस्तेमाल करके धन, पद और राजनीतिक शक्ति तो अर्जित कर लेते हैं, लेकिन जब संविधान, आरक्षण, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करने की आवश्यकता होती है, तब वे पीछे हट जाते हैं।

उन्होंने कहा, “बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर का अनुयायी होने का दावा करना आसान है, लेकिन उनके विचारों को समझना और उनके लिए संघर्ष करना कठिन है। केवल जय भीम बोलने, तस्वीर लगाने और कभी-कभार बयान देने से आंबेडकरवादी नहीं बना जा सकता।”
उन्होंने आगे कहा कि कुछ तथाकथित बहुजन नेता स्वयं जातीय संकीर्णता से ऊपर नहीं उठ पाए हैं। उनमें वैचारिक स्पष्टता, अध्ययन और संघर्ष की प्रतिबद्धता का अभाव दिखाई देता है। ऐसे लोग समाज को संगठित करने के बजाय छोटे-छोटे जातीय समूहों और निजी संगठनों में बांटकर अपनी राजनीतिक दुकान चला रहे हैं।
“बाबा साहेब ने शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो का संदेश दिया था, लेकिन आज कुछ लोग समाज को संगठित करने के बजाय जातियों में बांटकर अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं पूरी कर रहे हैं।”
IDBI बैंक के निजीकरण से आरक्षण और रोजगार पर खतरा
डॉ. उदित राज ने IDBI बैंक के प्रस्तावित निजीकरण पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और सरकारी प्रतिष्ठानों का निजीकरण केवल आर्थिक फैसला नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और आरक्षण व्यवस्था से भी जुड़ा हुआ मुद्दा है।
उन्होंने कहा कि IDBI बैंक की 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी कनाडा की Fairfax से जुड़े निवेशक समूह को बेचे जाने और लगभग ₹52,878 करोड़ के सौदे की खबरों ने कई सवाल खड़े किए हैं। उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, बैंक ने वित्त वर्ष 2025-26 में ₹9,513 करोड़ का मुनाफा कमाया और उसका सकल एनपीए घटकर 2.32 प्रतिशत रह गया।

उन्होंने सवाल किया, “जब कोई सार्वजनिक क्षेत्र का बैंक मुनाफे में चल रहा है और उसकी वित्तीय स्थिति में सुधार हो रहा है, तो उसे निजी हाथों में सौंपने की आवश्यकता क्यों है? आखिर इस निजीकरण से देश को क्या लाभ होगा और दलितों, आदिवासियों तथा पिछड़े वर्गों के रोजगार एवं आरक्षण पर क्या प्रभाव पड़ेगा?”
उन्होंने कहा कि निजीकरण के बाद भी बैंक पर भारतीय रिजर्व बैंक का नियमन और पात्र जमाओं पर डीआईसीजीसी का ₹5 लाख तक का बीमा संरक्षण लागू रहेगा, लेकिन सरकारी स्वामित्व और उससे जुड़ी जवाबदेही की प्रकृति बदल जाएगी।
डॉ. उदित राज ने आरोप लगाया कि भाजपा और आरएसएस की निजीकरण समर्थक नीतियों का सबसे गंभीर प्रभाव दलितों, आदिवासियों और पिछड़े वर्गों के रोजगार के अवसरों पर पड़ सकता है। सार्वजनिक क्षेत्र में संवैधानिक आरक्षण के माध्यम से इन वर्गों को प्रतिनिधित्व मिलता है, जबकि निजी क्षेत्र में ऐसी व्यापक अनिवार्य आरक्षण व्यवस्था नहीं है।
उन्होंने कहा, “सरकारी बैंक और प्रतिष्ठान बिकते जाएंगे, आरक्षण के अवसर सिमटते जाएंगे और बहुजन समाज जातियों तथा छोटे-छोटे संगठनों में बंटकर आपस में लड़ता रहेगा। इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है?”
उन्होंने बहुजन समाज से अपील की कि वह जातीय संकीर्णता, व्यक्तिगत स्वार्थ और संगठनात्मक विभाजन से ऊपर उठकर संविधान, आरक्षण, शिक्षा, रोजगार और लोकतंत्र की रक्षा के लिए एकजुट हो।
18 अक्टूबर को राष्ट्रीय स्तर पर होगा बड़ा फैसला
डॉ. उदित राज ने कहा कि 18 अक्टूबर को आयोजित बहुजन राष्ट्रीय संवाद केवल विचार-विमर्श का कार्यक्रम नहीं होगा, बल्कि संविधान और सामाजिक न्याय की रक्षा के लिए व्यापक जनसंघर्ष की दिशा तय करने का महत्वपूर्ण मंच बनेगा।
इसमें देशभर के कर्मचारी संगठनों, सामाजिक आंदोलनों, बुद्धिजीवियों, युवाओं और बहुजन प्रतिनिधियों की भागीदारी होगी। उन्होंने कहा कि अब समय केवल बयानबाजी, ज्ञापन देने और चुनावों की प्रतीक्षा करने का नहीं है। संविधान की रक्षा के लिए संगठित, लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण जनआंदोलन खड़ा करना होगा।

“संविधान बचेगा तो अधिकार बचेंगे, अधिकार बचेंगे तो आरक्षण बचेगा और आरक्षण बचेगा तो बहुजन समाज का भविष्य सुरक्षित रहेगा। इसलिए अब चुप रहने का नहीं, एकजुट होकर संघर्ष करने का समय है।”

कार्यक्रम विवरण:
बहुजन राष्ट्रीय संवाद — डोमा परिसंघ
दिनांक: रविवार, 18 अक्टूबर 2026
समय: प्रातः 10 बजे
स्थान: एनडीएमसी कन्वेंशन सेंटर, जंतर-मंतर के निकट, नई दिल्ली

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